स्टार्टअप की सोच
जिस दिन प्रिया ने नौकरी छोड़ी
प्रिया की ज़िंदगी अच्छी चल रही थी। Bangalore में MNC जॉब, ₹18 लाख का पैकेज, AC दफ़्तर, फ़्री स्नैक्स। इंजीनियरिंग कॉलेज के बाद चार साल से वहीं थी। अल्मोड़ा में माँ-पापा प्राउड थे। पड़ोसी बोलते थे "प्रिया बेटी जो Bangalore में काम करती है।"
फिर एक दिवाली, वो घर आई। नानी के गाँव गई, रानीखेत के पास। वहाँ उसने अपने मामा जी को देखा — 200 किलो ताज़ा माल्टा संतरे ट्रक पर लाद रहे थे। बिचौलिया ₹12 प्रति किलो दे रहा था। वही माल्टा Delhi और Bangalore के सुपरमार्केट्स में ₹60-80 प्रति किलो बिक रहा था। मामा जी को फ़ाइनल दाम का 20% भी नहीं मिल रहा था।
"ऐसे ही होता आया है," मामा जी ने कंधे उचकाकर बोला।
प्रिया का दिमाग़ रुक ही नहीं रहा था। Bangalore वापस, अपनी एर्गोनॉमिक चेयर पर बैठकर, बार-बार नंबर्स गणना कर रही थी। अगर किसानों को सीधे बायर्स से जोड़ दो — बस बीच के दो-तीन लेयर्स हटा दो — किसानों की आमदनी दोगुनी हो सकती है। उसने रिसर्च शुरू किया। और किसानों से बात की। हर जगह एक ही कहानी — उत्तराखंड के किसान एक ऐसे सिस्टम में फँसे हैं जो दशकों से नहीं बदला।
छह महीने बाद, प्रिया ने रिज़ाइन कर दिया।
माँ रोईं। पापा बोले, "बेटा, कम से कम शादी तो हो जाने दो।" कॉलेज फ़्रेंड्स बोले पागल हो गई। प्रबंधक बोला कंपनी हमेशा वापस ले लेगी।
लेकिन प्रिया को एक ऐसी समस्या मिल गई थी जिसे इग्नोर करना नामुमकिन था।
ये चैप्टर स्टार्टअप की तरह सोचने के बारे में है। सबको स्टार्टअप करना चाहिए — ऐसा बिल्कुल नहीं है। चैप्टर के एंड तक ये साफ़ हो जाएगा। लेकिन अगर करना है, तो पहले समझ लो कि इसमें क्या-क्या आता है।
स्टार्टअप स्मॉल बिज़नेस से कैसे अलग है?
चैप्टर 1 में हमने ब्रीफ़्ली देखा था। अब गहरे जाएँगे — क्योंकि इस किताब का पार्ट 3 पूरा स्टार्टअप पाथ के बारे में है।
स्मॉल बिज़नेस पहले दिन से फ़ायदेमंद होने के लिए बनाया जाता है। नैचुरल पेस से ग्रो होता है। पुष्पा दीदी की चाय की दुकान, भंडारी अंकल का हार्डवेयर स्टोर — ये पैसे कमाने और परिवार चलाने के लिए बने हैं।
स्टार्टअप एक अलग बेट पर बना है: शॉर्ट-टर्म मुनाफ़ा छोड़ो, लॉन्ग-टर्म में बहुत बड़ा ग्रो करो।
तीन चीज़ें स्टार्टअप को अलग बनाती हैं:
1. बढ़त माइंडसेट स्मॉल बिज़नेस साल में 10-20% ग्रो करे — बढ़िया है। स्टार्टअप महीने में 10-20% ग्रो करने की कोशिश करता है। पूरा स्ट्रक्चर एग्रेसिव बढ़त के लिए बना होता है।
2. स्केलेबल मॉडल चाय की दुकान ज़्यादा पैसे कमाती है ज़्यादा कप्स बेचकर — लेकिन एक फ़िज़िकल लिमिट है। स्टार्टअप कुछ ऐसा बनाता है (इस्तेमालुअली टेक्नोलॉजी) जो 10x ज़्यादा इस्तेमालर्स को सर्व कर सके बिना 10x ज़्यादा लागत के। प्रिया का ऐप 100 किसानों को कनेक्ट करे या 1 लाख किसानों को — सर्वर लागत बढ़ेगा, लेकिन प्रपोर्शनली नहीं।
3. वेंचर-बैकेबल स्टार्टअप्स बाहर से निवेश आकर्षित करने के लिए बने होते हैं। निवेशक पैसे लगाते हैं मंथली डिविडेंड के लिए नहीं — बल्कि इसलिए कि उन्हें लगता है कंपनी बहुत वैल्यूएबल बनेगी, और जब बिकेगी या IPO करेगी तो उनका पैसा मल्टीप्लाई होगा।
ज़रूरी बात: कोई मॉडल बेहतर नहीं है। एक फ़ायदेमंद स्मॉल बिज़नेस जो परिवार चलाए — वो जेन्यूइन सफलता है। एक स्टार्टअप जो ₹10 करोड़ रेज़ करे लेकिन ग्राहकों न ढूँढ पाए — वो असफलता है। स्टार्टअप सिर्फ़ इसलिए मत चुनो कि ग्लैमरस लगता है। तब चुनो जब एक बहुत बड़ी समस्या मिली हो जिसे हल करने के लिए स्केलेबल समाधान चाहिए।
समस्या-फ़र्स्ट थिंकिंग
स्टार्टअप सोच का सबसे ज़रूरी लेसन:
समस्या से प्यार करो, समाधान से नहीं।
ज़्यादातर पहली बार फ़ाउंडर्स उल्टा करते हैं। सोचते हैं: "मुझे ऐप बनाना है।" फिर ढूँढते हैं कि ऐप किस समस्या को हल करेगा। ये है समाधान-फ़र्स्ट थिंकिंग — और इससे अक्सर कुछ ऐसा बनता है जो कोई चाहता ही नहीं।
प्रिया ने ये नहीं कहा कि "मुझे एग्री-टेक ऐप बनाना है।" उसने अपने मामा जी को ₹12 में संतरे बेचते देखा जो ₹60 के थे। समस्या पहले आई। समाधान — चाहे जिस फ़ॉर्म में आए — बाद में।
कैसे पता चलेगा कि समस्या असली है?
- लोग पहले से इसे हल करने के लिए पैसे दे रहे हैं (चाहे बुरे तरीक़े से)। किसान पहले से कमीशन दे रहे थे बिचौलियों को — सिस्टम में पैसा फ़्लो हो रहा था।
- लोग बार-बार इसकी शिकायत करते हैं। हर किसान से प्रिया ने बात की — वही फ़्रस्ट्रेशन।
- मौजूदा समाधान टूटे हुए या पुराने हैं। मंडी सिस्टम दशकों से नहीं बदला। स्मार्टफ़ोन हर किसान की जेब में है, लेकिन कोई सीधे बेचने के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहा।
- तुम इसके बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रहे। ये पर्सनल है लेकिन रियल है। अगर समस्या को छोड़कर आगे बढ़ सकते हो — शायद ये तुम्हारा स्टार्टअप नहीं है।
प्रिया की समस्या नंबर्स में
प्रिया ने उत्तराखंड के एक टिपिकल किसान की माल्टा आपूर्ति चेन मैप की:
किसान बेचता है: ₹12/kg
गाँव का एग्रीगेटर: ₹3/kg मार्जिन लेता है
मंडी ट्रेडर: ₹8/kg मार्जिन लेता है
होलसेलर: ₹10/kg मार्जिन लेता है
रिटेलर: ₹15-20/kg मार्जिन लेता है
कंज़्यूमर देता है: ₹60-80/kg
किसान का हिस्सा: फ़ाइनल दाम का 15-20%
अगर प्रिया का प्लेटफ़ॉर्म किसानों को सीधे रिटेलर्स से कनेक्ट कर दे — बीच की दो लेयर्स हटा दे — तो किसान ₹12/kg की जगह ₹25-35/kg कमा सकता है। दोगुने से ज़्यादा।
ये समस्या हल करने लायक है।
लेकिन ऑपर्च्यूनिटी कितनी बड़ी है? निवेशक पूछेंगे। ख़ुद भी योजना के लिए चाहिए। यहाँ आता है मार्केट साइज़िंग।
मार्केट साइज़: TAM, SAM, SOM
जब कोई पूछे "तुम्हारा मार्केट कितना बड़ा है?" — तो असल में तीन सवाल पूछ रहा है:
TAM (कुल एड्रेसेबल मार्केट) — पूरा माँग अगर तुम सबको सर्व कर सको।
प्रिया के लिए: पूरा इंडियन फ़्रेश प्रोड्यूस मार्केट। लगभग ₹6-7 लाख करोड़ सालाना। बहुत बड़ा। लेकिन योजना के लिए मीनिंगलेस — प्रिया पूरे India का प्रोड्यूस मार्केट दर्ज नहीं करेगी।
SAM (सेवाेबल अवेलेबल मार्केट) — TAM का वो हिस्सा जो तुम्हारे ख़ास उत्पाद से एड्रेस हो सकता है।
प्रिया के लिए: उत्तराखंड और आस-पास के पहाड़ी इलाक़ों का फ़्रेश प्रोड्यूस, डिजिटल चैनल्स से। शायद ₹2,000-3,000 करोड़।
SOM (सेवाेबल ऑब्टेनेबल मार्केट) — SAM का वो हिस्सा जो तुम अगले 2-3 सालों में यथार्थवादीली दर्ज कर सकते हो।
प्रिया के लिए: कुमाऊँ और गढ़वाल के वो किसान जिनके पास स्मार्टफ़ोन है और जो नया प्लेटफ़ॉर्म ट्राई करने को तैयार हैं। शायद 3 साल में ₹50-100 करोड़ ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम।
TAM: ₹6-7 लाख करोड़ (पूरा इंडियन फ़्रेश प्रोड्यूस)
└── SAM: ₹2,000-3,000 करोड़ (उत्तराखंड + पहाड़, डिजिटल)
└── SOM: ₹50-100 करोड़ (कुमाऊँ/गढ़वाल, 2-3 साल)
ऑनेस्ट आंसर हमेशा SOM होता है। यही तुम्हारा असली प्लेइंग फ़ील्ड है।
टिप: निवेशक सैकड़ों पिचेस देखते हैं जहाँ फ़ाउंडर्स बोलते हैं "अगर हम ट्रिलियन-डॉलर मार्केट का सिर्फ़ 1% भी ले लें..." ये लेज़ी मैथ है। SOM बॉटम-अप गणना करके दिखाओ: कितने किसान ऑनबोर्ड होंगे, कितना ट्रांज़ैक्शन साइज़, कितनी बार। ये क्रेडिबल है।
लीन स्टार्टअप तरीक़ा
पुराने ज़माने में, पूरा उत्पाद बनाओ, लॉन्च करो, और उम्मीद करो कि लोग ख़रीदेंगे। महँगा और जोखिमी।
लीन स्टार्टअप मेथड (Eric Ries ने पॉपुलर किया) इसे उलटा करता है:
बिल्ड → मेज़र → लर्न → रिपीट
- बिल्ड — अपने उत्पाद का सबसे छोटा वर्शन बनाओ
- मेज़र — देखो क्या होता है जब रियल लोग इस्तेमाल करते हैं
- लर्न — सीखो क्या बदलना है, क्या सुधार करना है, क्या छोड़ना है
- रिपीट — तेज़ी से
गोल है कि कम से कम टाइम और पैसे में पता लगा लो कि आइडिया काम करेगा या नहीं। हर साइकल से कुछ सीखो।
प्रिया ने पहले ऐप नहीं बनाया। देखो उसने असल में क्या किया।
MVP: मिनिमम वायबल उत्पाद
MVP तुम्हारे उत्पाद का सबसे सिंपल वर्शन है जो कोर असंप्शन टेस्ट कर सके।
प्रिया की कोर असंप्शन: अगर किसान रियल-टाइम बायर दामेस देख सकें और सीधे बायर्स से कनेक्ट हो सकें, तो काफ़ी ज़्यादा कमाएँगे।
उसका MVP? एक WhatsApp ग्रुप।
प्रिया ने रानीखेत इलाक़ा के 23 किसानों और 5 बायर्स (हल्द्वानी की छोटी फ़्रूट शॉप्स और एक जूस कंपनी) का WhatsApp ग्रुप बनाया। रोज़ सुबह, मैन्युअली पूछती कि किस किसान के पास क्या है (टाइप, क्वांटिटी, अपेक्षित दाम) और ग्रुप में पोस्ट करती। बायर्स रिस्पॉन्ड करते। लॉजिस्टिक्स वो ख़ुद कोऑर्डिनेट करती — इस्तेमालुअली किसान ट्रक पर माल लाद देता और बायर डिलीवरी पर पे करता।
मेसी था। सब मैन्युअली कर रही थी। लेकिन दो हफ़्तों में, 4 किसानों ने सीधे बायर्स को बेचा — 40-60% ज़्यादा दाम पर!
इनफ़ सिग्नल। कोर असंप्शन वैलिड थी।
WhatsApp ग्रुप बनाने में ₹0 लगा। ऐप बनाने में ₹5-10 लाख लगते और 3-4 महीने लगते। अगर आइडिया नाकाम होता, तो सिर्फ़ टाइम गया होता, पैसा नहीं।
अच्छा MVP कैसा होता है:
| अच्छा MVP | बुरा MVP |
|---|---|
| एक कोर असंप्शन टेस्ट करता है | सब कुछ करने की कोशिश |
| दिनों या हफ़्तों में बन जाए | महीनों लगें |
| रियल इस्तेमालर्स, रियल ट्रांज़ैक्शन्स | इमेजिनरी इस्तेमालर्स के लिए डेमो |
| दिखने में बुरा लेकिन काम करे | ख़ूबसूरत लेकिन अनटेस्टेड |
| जल्दी कुछ सीखो | सारा पैसा ख़र्च हो जाए |
WhatsApp ग्रुप से कॉन्सेप्ट प्रूव होने के बाद, प्रिया ने एक सिंपल Android ऐप बनवाया (फ़्रीलांस डेवलपर से, ₹2 लाख में)। तीन स्क्रीन्स: किसान प्रोड्यूस लिस्ट करे, बायर ब्राउज़ करे और ऑर्डर दे, दोनों को नोटिफ़िकेशन मिले। कोई पेमेंट गेटवे नहीं, कोई लॉजिस्टिक्स ट्रैकिंग नहीं, कोई रेटिंग सिस्टम नहीं। बस कोर।
पिवट: कब डायरेक्शन बदलनी है
पिवट का मतलब है स्ट्रैटेजी बदलो, विज़न नहीं।
प्रिया का विज़न: किसानों की आमदनी बढ़ाना, बेहतर मार्केट्स से कनेक्ट करके।
लेकिन उसकी ओरिजिनल स्ट्रैटेजी — इंडिविजुअल किसानों को इंडिविजुअल छोटे रिटेलर्स से कनेक्ट करना — एक दीवार से टकराई। छोटे रिटेलर्स अनरिलायबल थे। ऑर्डर्स कैंसल करते, डिलीवरी के बाद दाम नेगोशिएट करते, या ग़ायब हो जाते।
तो उसने पिवट किया। छोटे रिटेलर्स की जगह इंस्टीट्यूशनल बायर्स — जूस कंपनीज़, होटल चेन्स, हॉस्पिटल कैंटीन्स जिन्हें नियमित, बल्क आपूर्ति चाहिए। कम बायर्स, लेकिन बहुत ज़्यादा रिलायबल माँग।
वही समस्या। वही मिशन। अलग तरीक़ा।
कब पिवट करना चाहिए?
- मापदंड महीनों की मेहनत के बाद भी फ़्लैट हैं
- इस्तेमालर्स साइन अप करते हैं लेकिन वापस नहीं आते
- करंट काम के बग़ल में बहुत बड़ी ऑपर्च्यूनिटी दिख रही है
- पेइंग ग्राहकों उत्पाद को उस तरीक़े से इस्तेमाल कर रहे हैं जो तुमने सोचा नहीं था (इस सिग्नल को पालन करो)
कब पिवट नहीं करना चाहिए?
- चीज़ें मुश्किल हैं (वो हमेशा मुश्किल होती हैं)
- सिर्फ़ 2 महीने हुए हैं (बहुत जल्दी है)
- Twitter पर किसी ने बोला आइडिया ख़राब है (इग्नोर करो)
- कॉम्पिटिटर ने कुछ सिमिलर लॉन्च किया (कॉम्पिटीशन मार्केट वैलिडेट करता है)
अंकिता का पिवट: अंकिता ने अपना पहाड़ी फ़ूड ब्रांड रिटेल स्टोर्स के थ्रू बेचने की योजना से शुरू किया। मार्जिन्स टेरिबल थे — स्टोर्स 30-40% कमीशन माँग रहे थे। उसने D2C (सीधा टू कंज़्यूमर) ऑनलाइन सेल्स पर पिवट किया। सेम उत्पाद, सेम ब्रांड, पूरा डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल बदल गया। मार्जिन्स ड्रामैटिकली सुधार हुए।
इमोशनल रियलिटी
चलो ऑनेस्ट बात करते हैं — स्टार्टअप शुरू करने में असलीी कैसा लगता है।
अकेलापन। MNC फ़्रेंड्स वेकेशन फ़ोटोज़ डाल रहे हैं। तुम हल्द्वानी के एक किराए के कमरे में अकेले बैठे हो, रात 2 बजे सर्वर डीबग कर रहे हो। आसपास कोई नहीं समझता कि तुम क्या बना रहे हो और क्यों।
अनसर्टेंटी। कोई प्रबंधक नहीं बता रहा क्या करना है। कोई क्वार्टरली समीक्षा नहीं। कोई गारंटीड पेचेक नहीं। रोज़ सुबह ख़ुद तय करो क्या ज़रूरी है — और अक्सर ग़लत तय करते हो।
फ़ैमिली प्रेशर। "बेटा, इतनी अच्छी जॉब थी।" "तुम्हारे कज़िन का सीनियर प्रबंधक बन गया।" "कब तक ठीक से कमाओगे?" उत्तराखंड में, जहाँ गवर्नमेंट जॉब गोल्ड स्टैंडर्ड है, स्टार्टअप चुनना कुछ फ़ैमिलीज़ के लिए बिट्रेयल जैसा लगता है।
सेल्फ़-डाउट। कुछ दिन लगता है जीनियस हो। ज़्यादातर दिन लगता है ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती कर दी।
फ़ाइनैंशियल स्ट्रेस। प्रिया 14 महीने अपनी सेविंग्स पर जी। डिनर्स छोड़ना किए, तीन रूममेट्स के साथ फ़्लैट शेयर किया, हर शादी में जाना बंद किया। सेविंग्स ख़त्म होना एक रियल, फ़िज़िकल एंग्ज़ाइटी है।
प्रिया की माँ हर संडे कॉल करती थीं। पहले छह महीने, हर कॉल इसी पर ख़त्म होती: "वापस आ जा बेटा। अभी भी देर नहीं हुई।" आठवें महीने के आसपास, जब प्रिया ने एक किसान का वीडियो दिखाया जो थैंक यू बोल रहा था — क्योंकि उसने अपने सेब पिछले साल से 50% ज़्यादा दाम पर बेचे — तो माँ चुप हो गईं। फिर बोलीं, "ठीक है। लेकिन खाना ठीक से खाया कर।"
ये रियल है। अगर स्टार्टअप करना है, तो इसके लिए तैयार रहो। सपोर्ट सिस्टम बनाओ — चाहे बस एक-दो लोग हों जो तुम पर बिलीव करते हैं।
सबको स्टार्टअप नहीं करना चाहिए
ये शायद इस चैप्टर का सबसे ज़रूरी सेक्शन है।
स्टार्टअप शुरू करना कोई मॉरल वर्च्यू नहीं है। ये जॉब से बेहतर नहीं है। स्मॉल बिज़नेस से बेहतर नहीं है। ये एक ख़ास चॉइस है — ख़ास टाइप की समस्या के लिए और ख़ास टाइप के इंसान के लिए।
स्टार्टअप मत करो अगर:
- बस अपना बॉस ख़ुद बनना है (तो स्मॉल बिज़नेस करो — कम जोखिम, जल्दी आमदनी)
- जल्दी अमीर बनना है (स्टार्टअप्स 7-10 साल लेते हैं; ज़्यादातर नाकाम होते हैं)
- कोई ख़ास समस्या नहीं है जो दिमाग़ से हटती नहीं (मुश्किल आएगी तो छोड़ दोगे)
- 1-2 साल फ़ाइनैंशियल अनसर्टेंटी सँभालना नहीं कर सकते
- बुरी जॉब से भाग रहे हो बजाय किसी कम्पेलिंग समस्या की तरफ़ दौड़ने के
स्टार्टअप कंसीडर करो अगर:
- एक बड़ी, पेनफ़ुल समस्या मिली है जिसे टेक्नोलॉजी स्केल पर हल कर सकती है
- सालों तक कम ख़र्चे में रहने को तैयार हो
- समस्या इलाक़ा में डीप एक्सपर्टीज़ है (या डेवलप कर सकते हो)
- रिजेक्शन, असफलता, और अनसर्टेंटी बिना टूटे सँभाल सकते हो
- कुछ फ़ाइनैंशियल रनवे है (सेविंग्स, फ़ैमिली सपोर्ट, या वर्किंग स्पाउस)
एक तीसरा विकल्प है जिसके बारे में कोई बात नहीं करता: पहले स्मॉल बिज़नेस करो, फिर स्टार्टअप बनाओ। अंकिता ने एक साल किचन-बेस्ड फ़ूड बिज़नेस चलाया, उसके बाद सही D2C ब्रांड बनाया। स्मॉल बिज़नेस ने उसे राजस्व दिया, ग्राहक समझिंग दी, और आत्मविश्वास दिया। स्टार्टअप थिंकिंग बाद में आई, जब वो स्केल करने को तैयार थी।
आइडिया वैलिडेशन चेकलिस्ट
जॉब छोड़ने से पहले, बिज़नेस प्लान लिखने से पहले, किसी को बताने से पहले — अपना आइडिया इस चेकलिस्ट से चेक करो:
1. समस्या वैलिडेशन
- समस्या एक सेंटेंस में डिस्क्राइब कर सकते हो?
- ये समस्या पर्सनली अनुभव किया या करीब से देखा?
- कम से कम 20 लोगों से बात की जिनकी ये समस्या है?
- लोग पहले से इसे हल करने के लिए पैसे (या अहम टाइम) दे रहे हैं — चाहे बुरे तरीक़े से?
2. समाधान वैलिडेशन
- समाधान एक सेंटेंस में डिस्क्राइब कर सकते हो?
- समाधान करंट अल्टरनेटिव से 10x बेहतर है (सिर्फ़ 2x नहीं)?
- MVP 4 हफ़्तों में बन सकता है?
- कम से कम 5 लोग बोले हैं कि पे करेंगे?
3. मार्केट वैलिडेशन
- मार्केट इतना बड़ा है कि वेंचर-स्केल बिज़नेस बन सके? (SOM > ₹50 करोड़)
- मार्केट बढ़ रहा है?
- कम्पेरेबल कंपनीज़ हैं जो सक्सीड हुई (प्रूविंग मार्केट एग्ज़िस्ट्स)?
4. फ़ाउंडर वैलिडेशन
- डीप डोमेन एक्सपर्टीज़ है (या डेवलप कर सकते हो)?
- कम से कम 12 मंथ्स का फ़ाइनैंशियल रनवे है?
- फ़ुल-टाइम डेडिकेट कर सकते हो?
- जो हुनर नहीं हैं, वो कॉम्प्लीमेंट कर सकते हो? (नॉन-टेक्निकल हो तो टेक्निकल को-फ़ाउंडर मिल सकता है?)
अगर ज़्यादातर बॉक्सेस चेक हो रहे हैं — सब नहीं, लेकिन ज़्यादातर — तो पर्सू करने लायक है। अगर सिर्फ़ 3-4 चेक हो रहे हैं, तो लीप लेने से पहले और वैलिडेट करो।
पहले 90 दिन
अगर तय कर लिया है कि शुरू करना है, तो पहले तीन महीनों का व्यावहारिक फ़्रेमवर्क:
दिन 1-30: समस्या में डीप डाइव
- 50+ पोटेंशियल इस्तेमालर्स से बात करो
- करंट वैल्यू चेन मैप करो (कौन क्या करता है, कौन किसे पे करता है, वैल्यू कहाँ लीक होती है?)
- सबसे तीखे 2-3 पेन पॉइंट्स आइडेंटिफ़ाई करो
- कॉम्पिटिटर्स और अल्टरनेटिव्स स्टडी करो ("कुछ मत करो" अल्टरनेटिव भी)
- एक पेज का समस्या स्टेटमेंट लिखो
दिन 31-60: MVP बनाओ और टेस्ट करो
- सबसे सिंपल समाधान बनाओ (WhatsApp ग्रुप, Google Form, लैंडिंग पेज, बुनियादी ऐप)
- 10-20 रियल इस्तेमालर्स के हाथ में दो
- मेज़र करो: इस्तेमाल कर रहे हैं? वापस आ रहे हैं? दूसरों को बता रहे हैं?
- जो सीखो उससे इटरेट करो
- हर अर्ली इस्तेमालर से पर्सनली बात करो
दिन 61-90: तय करो और कमिट करो
- अर्ली साइन्स ऑफ़ उत्पाद-मार्केट फ़िट दिख रहे हैं?
- बिज़नेस मॉडल आर्टिकुलेट कर सकते हो (पैसे कैसे आएँगे)?
- कुछ ऐसा सीखा जो और एक्साइटेड कर रहा है, लेस नहीं?
- को-फ़ाउंडर ढूँढ लिया या ढूँढना शुरू किया?
- पहले 3 मंथ्स के गोल्स सेट करो: इस्तेमालर काउंट, ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम, राजस्व टारगेट
प्रिया के पहले 90 दिन: वीक 1-4 कुमाऊँ भर में मंडियाँ और बग़ीचे विज़िट किए। वीक 5-8 WhatsApp ग्रुप एक्सपेरिमेंट चलाया। वीक 9-12 इतना वैलिडेशन मिल चुका था कि फ़ुल-टाइम कमिट कर सके और ऐप बनाना शुरू करे। जल्दबाज़ी नहीं की। लेकिन बिल्कुल सही इन्फ़ॉर्मेशन का इंतज़ार भी नहीं किया।
उत्तराखंड का फ़ायदा
एक आख़िरी बात: उत्तराखंड से स्टार्टअप शुरू करने के रियल फ़ायदाेस हैं जो Bangalore या Mumbai के फ़ाउंडर्स के पास नहीं।
कम बर्न रेट। हल्द्वानी या देहरादून में रहने का ख़र्च Bangalore का फ़्रैक्शन है। प्रिया का मंथली ख़र्च ₹1.2 लाख था। Bangalore में सेम ₹3-4 लाख होता। कम बर्न = ज़्यादा रनवे = ज़्यादा टाइम चीज़ें फ़िगर आउट करने का।
समस्या के करीब। अगर स्टार्टअप रूरल India सर्व करता है, तो रूरल India में होना फ़ायदा है, नुक़सान नहीं। प्रिया हर हफ़्ते किसानों से मिल सकती थी। Bangalore का एग्री-टेक फ़ाउंडर क्वार्टर में एक बार फ़्लाई करके आता।
पर्सपेक्टिव की यूनीकनेस। निवेशक Bangalore से 100 फ़ूड डिलीवरी ऐप्स देखते हैं। पहाड़ में पली-बढ़ी किसान परिवार की लड़की का बनाया एग्री-टेक प्लेटफ़ॉर्म — ये रेयरली देखते हैं। तुम्हारा पर्सपेक्टिव तुम्हारा मोट है।
गवर्नमेंट सपोर्ट। उत्तराखंड में स्टार्टअप पॉलिसीज़, इनक्यूबेशन सेंटर्स (SIDCUL Haridwar जैसे), और एग्री-टेक, रूरल इनोवेशन के ख़ास स्कीम्स हैं। रिसर्च करो क्या अवेलेबल है।
नुक़सान: टैलेंट और निवेशक नेटवर्क्स तक एक्सेस, जो मेट्रोज़ में कॉन्सन्ट्रेटेड है। लेकिन रिमोट-वर्क वाली दुनिया में, ये गैप तेज़ी से बंद हो रहा है।
की टेकअवेज़
- स्टार्टअप स्मॉल बिज़नेस से अलग है: एग्रेसिव बढ़त और स्केलेबल मॉडल पर बना होता है
- समस्या से शुरू करो, समाधान से नहीं
- मार्केट ऑनेस्टली साइज़ करो: TAM → SAM → SOM
- बिल्ड → मेज़र → लर्न साइकल इस्तेमाल करो — तेज़ चलो, कम बर्बाद करो
- MVP शर्मिंदगी भरा सिंपल होना चाहिए — प्रिया ने WhatsApp ग्रुप से शुरू किया
- पिवट तब करो जब डेटा बोले स्ट्रैटेजी काम नहीं कर रही, फ़्रस्ट्रेशन में नहीं
- इमोशनल लागत रियल है — अकेलापन, फ़ैमिली प्रेशर, फ़ाइनैंशियल स्ट्रेस
- सबको स्टार्टअप नहीं करना चाहिए। एक बढ़िया स्मॉल बिज़नेस उतना ही वैलिड पाथ है।
अगले चैप्टर में, प्रिया का WhatsApp ग्रुप काम कर गया है। अब रियल उत्पाद बनाना है। लेकिन जब डेवलपर नहीं हो तो उत्पाद कैसे बनाते हैं? पहले कौन सा फ़ीचर बनाना चाहिए? और कैसे पता चलेगा कि उत्पाद सच में काफ़ी अच्छा है?