खेती और उससे जुड़े बिज़नेस
वो सेब जो रास्ते में खो गया
अप्रैल की सुबह है, रानीखेत। कोहरा पूरा नहीं छँटा, और रावत जी के बग़ीचे के पीछे की हिमालय की चोटियाँ अभी बादलों में छुपी हैं। वो सेब के पेड़ों के बीच चल रहे हैं — कटाई कर रहे हैं, कीड़ों की जाँच कर रहे हैं, डालियों को सहारा बाँध रहे हैं। पिछले हफ़्ते फूल आए थे। अगर मौसम ठीक रहा, तो अगस्त-सितंबर तक अच्छी फ़सल होगी।
रावत जी 18 साल से सेब उगा रहे हैं। उन्हें हर पेड़ पहचान है, बच्चों की तरह। कौन सी वैराइटी किस ऊँचाई पर अच्छी होगी, कौन सी खाद किस मिट्टी में काम करेगी, कब स्प्रे करना है, कब रुकना है — सब पता है।
लेकिन एक अलग सवाल पूछो — "पिछले साल कितना मुनाफ़ा हुआ?" — तो चुप हो जाते हैं।
इतना पता है: मंडी के एजेंट को ₹30-40 प्रति kg में बेचे। एजेंट ने होलसेलर को बेचे। होलसेलर ने Delhi के रिटेलर को। जब लाजपत नगर में किसी ग्राहक ने रावत जी के वही सेब उठाए, तो रेट था ₹150-200/kg।
₹30 से ₹200। फ़र्क़ कहाँ गया?
रावत जी को ठीक से पता नहीं। बस इतना पता है — उनके पास नहीं आया।
ये चैप्टर इसी बदलाव के बारे में है। सिर्फ़ रावत जी के लिए नहीं, बल्कि उत्तराखंड के हर किसान, बागवान, और खेती से जुड़े इंसान के लिए — जो बहुत मेहनत करता है लेकिन अपनी वैल्यू का बहुत छोटा हिस्सा पाता है।
India में एग्रीकल्चर सिर्फ़ एक सेक्टर नहीं — 60% आबादी की रीढ़ है। उत्तराखंड में तो और भी पर्सनल है। ज़मीन ढलान पर, खेत छोटे, मौसम अनिश्चित, और बाज़ार दूर। लेकिन प्रोड्यूस — सेब, माल्टा, ऑफ़-सीज़न सब्ज़ी, जड़ी-बूटी, शहद — प्रीमियम दाम पर बिक सकता है अगर सही बायर तक सही फ़ॉर्म में पहुँचे।
की वर्ड है अगर।
खेती को बिज़नेस की तरह ट्रीट करो — जीवित रहना नहीं
India के ज़्यादातर किसान खेती को बिज़नेस नहीं मानते। उनके लिए ये वही काम है जो बाप ने किया, दादा ने किया। ज़मीन है, सीज़न आया, बो दिया, काट लिया, एजेंट ने जो दाम दिए ले लिया।
ये बिज़नेस नहीं है। ये जीवित रहना है।
बिज़नेस मतलब: मुझे पता है मेरी लागत क्या है। मुझे पता है कितने में बिक सकता है। और मैं फ़ैसले ले रहा हूँ ताकि इन दोनों के बीच का गैप बढ़े।
रावत जी का लागत एनालिसिस — जो अभ्यास उन्होंने कभी की ही नहीं थी
जब हमने रावत जी के साथ बैठकर एक सीज़न की पूरी लागत गणना की, तो ये निकला:
| लागत आइटम | सालाना ख़र्चा (1 एकड़ बग़ीचा) |
|---|---|
| मज़दूरी (कटाई, स्प्रे, तुड़ाई, छँटाई) | ₹45,000 |
| खाद और गोबर | ₹12,000 |
| कीटनाशक और स्प्रे | ₹8,000 |
| पानी (सिंचाई, पाइप बनाए रखेंस) | ₹5,000 |
| पैकेजिंग (टोकरी, बॉक्सेज़) | ₹10,000 |
| ट्रांसपोर्ट (हल्द्वानी मंडी तक) | ₹15,000 |
| मंडी कमीशन + लदाई-उतराई | ₹8,000 |
| बाक़ी (टूल्स, रिपेयर्स, नए पेड़) | ₹7,000 |
| कुल ख़र्चा | ₹1,10,000 |
पैदावार: अच्छे साल में लगभग 3,000 kg प्रति एकड़।
मंडी में बिक्री रेट: ₹30-40/kg। एवरेज ₹35 मान लो।
Revenue = 3,000 kg × ₹35 = ₹1,05,000
Cost = ₹1,10,000
Profit = -₹5,000
रावत जी घाटा में थे। अच्छे साल में भी। काग़ज़ पर वो फ़्री में काम कर रहे थे — या उससे भी बुरा। सेंस इसलिए नहीं आया क्योंकि अपनी मेहनत काउंट नहीं की, और घरवालों ने बिना तनख़्वाह काम किया।
पहला सबक: अगर तुमने पर किलोग्राम लागत ऑफ़ प्रोडक्शन गणना नहीं की, तो तुम्हें पता ही नहीं है कि कमा रहे हो या गँवा रहे हो।
रावत जी की लागत पर kg: ₹1,10,000 ÷ 3,000 = लगभग ₹37/kg।
बेचते थे ₹35/kg पर। मैथ झूठ नहीं बोलती।
अभी करो: खेती से जुड़ा हर इंसान — आज रात बैठकर एक सीज़न की हर लागत लिखो। सब कुछ। मज़दूरी, खाद, डीज़ल, ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, मंडी फ़ी, फ़ोन कॉल्स, मज़दूरों का खाना। कुल ख़र्चे को कुल पैदावार (kg में) से डिवाइड करो। वो है तुम्हारी लागत पर यूनिट. अगर बिक्री का रेट उससे कम है — तो घाटा हो रहा है, और कितनी भी मेहनत करो, मैथ नहीं बदलेगी। कुछ बदलना पड़ेगा — लागत कम करो, यील्ड बढ़ाओ, बेहतर दाम ढूँढो, या वैल्यू ऐड करो।
वैल्यू एडिशन — गेम बदलावर
इस चैप्टर का सबसे ताक़तवर कॉन्सेप्ट:
कच्चा माल ₹X में बिकता है। प्रक्रिया्ड माल 3-10X में।
नंबर्स देखो:
| उत्पाद | कच्ची क़ीमत | प्रक्रिया्ड क़ीमत | गुणा |
|---|---|---|---|
| सेब (पर kg) | ₹40 | एप्पल जूस: ₹200/लीटर | 5x |
| सेब (पर kg) | ₹40 | ड्राइड एप्पल चिप्स: ₹500/kg | 12x |
| सेब (पर kg) | ₹40 | एप्पल साइडर विनेगर: ₹600/लीटर | 15x |
| मिक्स्ड फ़्रूट्स | ₹60/kg | फ़्रूट जैम: ₹300/kg | 5x |
| जड़ी-बूटी (रॉ) | ₹50/kg | हर्बल टी ब्लेंड: ₹800/kg | 16x |
| माल्टा (संतरा) | ₹25/kg | माल्टा स्क्वॉश: ₹250/लीटर | 10x |
अंकिता का अचार सबक सिखाता है
अंकिता रॉ इंग्रीडिएंट्स — आम, हरी मिर्च, सरसों का तेल, मसाले — ₹80 में ख़रीदती है। उसका तैयार पहाड़ी अचार, ब्रांडेड जार में "Pahadi Flavors" लेबल और FSSAI नंबर के साथ, ₹350 में बिकता है। 4x मल्टीप्लायर।
ट्रांसफ़ॉर्मेशन: धोना, काटना, मिलाना, पकाना, भरना, सील करना, लेबल लगाना — और वो स्वाद जो दादी की रेसिपी से आता है। यही प्रक्रियािंग — यही वो जगह है जहाँ पैसा है।
वैल्यू एडिशन सिर्फ़ फ़ूड प्रक्रियािंग नहीं। इसमें शामिल है:
- ग्रेडिंग और सॉर्टिंग — ग्रेड A सेब मिक्स्ड-ग्रेड से 2x में बिकता है
- पैकेजिंग — 1kg ब्रांडेड बॉक्स लूज़ kg से ज़्यादा में बिकता है
- ब्रांडिंग — "Ranikhet Organic Apples" की एक कहानी है; बेनाम सेब की नहीं
- सर्टिफ़िकेशन — ऑर्गेनिक सर्टिफ़ाइड माल 20-40% प्रीमियम पर बिकता है
- प्रक्रियािंग — जूस, चिप्स, जैम, अचार, सूखे मेवे, सिरका
- टाइमिंग — कोल्ड स्टोरेज में रखकर February में बेचे सेब September के 2x में बिकते हैं
FSSAI — प्रक्रिया्ड फ़ूड बेचना है तो ज़रूरी है
कोई भी प्रक्रिया्ड या पैकेज्ड फ़ूड उत्पाद बेच रहे हो, तो FSSAI लाइसेंस चाहिए। कोई एक्सेप्शन नहीं।
| टाइप | किसके लिए | सालाना टर्नओवर | फ़ी |
|---|---|---|---|
| बुनियादी रजिस्ट्रेशन | घर से, छोटा फ़ूड बिज़नेस | ₹12 लाख तक | ₹100/साल |
| स्टेट लाइसेंस | मीडियम फ़ूड बिज़नेस | ₹12 लाख - ₹20 करोड़ | ₹2,000-5,000/साल |
| सेंट्रल लाइसेंस | बड़े मैन्युफ़ैक्चरर्स, एक्सपोर्टर्स | ₹20 करोड़ से ऊपर | ₹7,500/साल |
ज़्यादातर छोटे प्रक्रियार्स को बुनियादी रजिस्ट्रेशन या स्टेट लाइसेंस चाहिए। प्रक्रिया ऑनलाइन है (foscos.fssai.gov.in), ख़ुद कर सकते हो। अंकिता ने बुनियादी रजिस्ट्रेशन से शुरू किया — दो हफ़्ते लगे, ₹100 ख़र्च हुआ।
उत्तराखंड में खेती के ख़ास मौक़े
उत्तराखंड की ज्योग्राफ़ी — ऊँचाई, जलवायु, साफ़ पानी, कम पॉल्यूशन — असल में कॉम्पिटिटिव फ़ायदा है अगर सही से इस्तेमाल करो।
फल
- सेब — रानीखेत, चौबटिया, अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ के ऊँचे इलाक़े
- स्टोन फ़्रूट्स — आलूबुख़ारा, आड़ू, ख़ुमानी — अक्सर बर्बाद हो जाते हैं क्योंकि मार्केट लिंकेज नहीं
- माल्टा — उत्तराखंड की पहाड़ियों का ख़ास, शहरों में माँग बढ़ रही है
- कीवी — नई शुरुआत, 1000-1500m पर बढ़िया पोटेंशियल
ऑफ़-सीज़न सब्ज़ियाँ
ये बहुत बड़ा अवसर है। जब मैदानों में गर्मी से कुछ सब्ज़ियाँ नहीं उग सकतीं (मई-अगस्त), पहाड़ के किसान उगाकर Delhi, Lucknow, Chandigarh में 2-3x प्रीमियम पर बेच सकते हैं।
- कैप्सिकम, टमाटर, मटर, फ़्रेंच बीन्स, ब्रॉकली, एक्ज़ॉटिक ग्रीन्स
- भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट चाहिए — यही बॉटलनेक है
- कुछ किसान बस पार्सल और कूरियर से भेजने लगे हैं
जड़ी-बूटी और औषधीय पौधे
उत्तराखंड हिमालय की फ़ार्मेसी है:
- तेजपत्ता — जंगल में उगता है, तोड़कर बेच सकते हो
- जटामांसी — हाई-वैल्यू मेडिसिनल प्लांट, रेगुलेटेड लेकिन उगा सकते हो
- रिंगाल (बाँस) — टोकरी, कंस्ट्रक्शन, क्राफ़्ट्स में माँग बढ़ रही है
- बुराँश — फूलों से जूस, स्क्वॉश, हर्बल उत्पाद बनते हैं
- टिमूर (Sichuan pepper) — गोरमे कुकिंग में माँग बढ़ रही है
- कुटकी, चिरायता, अतीस — आयुर्वेदिक मार्केट में एस्टैब्लिश्ड माँग
और अवसरज़
- ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग — बढ़ती माँग, 20-40% प्रीमियम, उत्तराखंड की फ़ार्मिंग पहले से लगभग ऑर्गेनिक है
- शहद — मल्टी-फ़्लोरा हिल हनी ₹400-800/kg, मैदानी शहद ₹200/kg
- मशरूम कल्टिवेशन — कम जगह चाहिए, अच्छा मार्जिन, ऑयस्टर और शिटाके
- फूलों की खेती — गेंदा, ग्लैडिओलस, ऑर्किड — पहाड़ी क्लाइमेट सूट करती है
- अख़रोट — कई जगह पहले से उगते हैं, प्रक्रियािंग और मार्केटिंग बेहतर करनी है
सीधा-टू-कंज़्यूमर: बिचौलियों को काटो
ट्रेडिशनल चेन ऐसी दिखती है:
किसान → मंडी एजेंट → होलसेलर → रिटेलर → ग्राहक
₹35/kg ₹55/kg ₹90/kg ₹150/kg ₹200/kg
हर चरण पर कोई अपना हिस्सा लेता है। जब तक सेब ग्राहक तक पहुँचता है, किसान का शेयर 20% से कम है। सोल्यूशन? चेन छोटी करो।
प्रिया का एग्री-टेक ऐप
प्रिया ने एक ऐप बनाया जो पहाड़ के किसानों को सीधे बायर्स से जोड़ता है — रेस्टोरेंट्स, जूस शॉप्स, ऑर्गेनिक स्टोर्स, और इंडिविजुअल कंज़्यूमर्स, Delhi-NCR और देहरादून में। किसान लिस्ट करते हैं (फ़सल, क्वांटिटी, हार्वेस्ट डेट), बायर्स एडवांस में ऑर्डर करते हैं।
पिछले September जब रावत जी ने अपने सेब ऐप पर लिस्ट किए, तो 500 kg सीधे तीन रेस्टोरेंट्स और एक ऑर्गेनिक स्टोर को Gurgaon में बेचे। रेट? ₹80/kg — मंडी एजेंट से दोगुने से ज़्यादा।
बाक़ी सेब मंडी से ही बेचे। धीरे-धीरे। लेकिन उन 500 kg ने ₹80/kg पर एक बात सिखाई जो मंडी ने कभी नहीं सिखाई: उनके सेबों का एक नाम है, एक कहानी है, और एक ग्राहक है जिसे गुणवत्ता की परवाह है।
और सीधा-टू-कंज़्यूमर चैनल्स
ऑनलाइन मार्केटप्लेसेज़:
- Amazon Fresh, BigBasket, JioMart — किसानों और FPO से सोर्स करते हैं
- लगातार गुणवत्ता, ग्रेडिंग, और पैकेजिंग स्टैंडर्ड्स चाहिए
- मिनिमम वॉल्यूम्स अक्सर ज़रूरी
फ़ार्म-टू-टेबल रेस्टोरेंट साझेदारी्स:
- देहरादून, ऋषिकेश, मसूरी के रेस्टोरेंट्स एक्टिवली लोकल, ऑर्गेनिक प्रोड्यूस ढूँढते हैं
- रिश्ता बनाओ — सैम्पल्स लेकर जाओ, लगातार आपूर्ति पेशकश करो
- रिलायबिलिटी और गुणवत्ता के लिए प्रीमियम दाम
फ़ार्मर मार्केट्स और ऑर्गेनिक बाज़ार:
- देहरादून (दून ऑर्गेनिक मार्केट), Delhi (कई जगह्स) में वीकली ऑर्गेनिक मार्केट्स
- सीधा ग्राहक इंटरेक्शन — ब्रांड बनता है, लॉयल्टी बनती है
- वॉल्यूम कम लेकिन मार्जिन्स बहुत ज़्यादा
WhatsApp-बेस्ड सीधा सेलिंग:
- 100-200 नियमित ग्राहकों की ब्रॉडकास्ट लिस्ट बनाओ
- ताज़ी फ़सल की फ़ोटोज़, दामेज़, डिलीवरी विकल्प शेयर करो
- बहुत इफ़ेक्टिव है — कई अर्बन कंज़्यूमर्स को ये पर्सनल टच पसंद है
- नीमा और ज्योति मुनस्यारी से अपने गेस्ट्स के लिए ये करती हैं — "आने से पहले ताज़ी राजमा और लोकल शहद चाहिए? WhatsApp करो"
सच्ची बात: सीधा सेलिंग में वो एफ़र्ट लगता है जो मंडी में नहीं लगता — सॉर्टिंग, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, ग्राहकों से बात, कम्प्लेंट्स सँभालना, डिलीवरी अरेंज करना। ज़्यादा काम है। लेकिन ज़्यादा पैसा भी है और ज़्यादा कंट्रोल भी। तुम ब्रांड बना रहे हो, सिर्फ़ कमोडिटी नहीं बेच रहे।
बिचौलिया समस्या — और उसका सोल्यूशन
APMC मंडी सिस्टम कैसे काम करती है
India की Agricultural Produce Market Committees (APMC) बनी थीं किसानों को बचाने के लिए — फ़ेयर, ट्रांसपेरेंट ऑक्शन हो। अभ्यास में सिस्टम अक्सर किसानों के ख़िलाफ़ काम करती है:
- किसान प्रोड्यूस मंडी में लाता है
- कमीशन एजेंट (आढ़तिया/दलाल) अनिवार्य बिचौलिया है
- एजेंट 5-10% कमीशन लेता है
- लदाई, उतराई, तुलाई — और 2-3% जाता है
- पेमेंट अक्सर देर से — कभी-कभी हफ़्तों बाद
- किसान के पास बार्गेनिंग पावर नहीं — बायर्स मार्केट है
- अगर माल पेरिशेबल है और किसान दूर से आया है, तो एजेंट जानता है कि वापस नहीं ले जा सकता
सिस्टम बुरी नहीं है — करोड़ों किसानों को मार्केट एक्सेस देती है। लेकिन इनकुशल है, ओपेक है, और वैल्यू का बहुत बड़ा हिस्सा ख़ुद रख लेती है जो प्रोड्यूसर को मिलना चाहिए।
सोल्यूशन्स जो काम कर रहे हैं
eNAM (Electronic National Agriculture Market):
- ऑनलाइन ट्रेडिंग पोर्टल जो स्टेट्स की APMC को कनेक्ट करता है
- बेचने से पहले अलग-अलग मंडियों के रेट्स देख सकते हो
- इन्फ़ॉर्मेशन एसिमेट्री कम होती है
- रजिस्ट्रेशन फ़्री है: enam.gov.in
FPO (Farmer Producer Organizations): छोटे किसानों के लिए शायद इस चैप्टर का सबसे ज़रूरी कॉन्सेप्ट।
FPO एक कलेक्टिव है — किसानों का ग्रुप जो मिलकर कंपनी रजिस्टर करते हैं और एक यूनिट की तरह ऑपरेट करते हैं। 50 अलग-अलग किसान एजेंट से नेगोशिएट करें, बजाय इसके FPO 50 किसानों के प्रोड्यूस की तरफ़ से एक एंटिटी के रूप में नेगोशिएट करता है।
फ़ायदे:
- कलेक्टिव बार्गेनिंग — वॉल्यूम से बेहतर दाम
- शेयर्ड लागतें — एक कोल्ड स्टोरेज, एक व्हीकल, एक सेट इक्विपमेंट
- सीधा सेल्स — FPO सीधे रिटेलर्स, एक्सपोर्टर्स, प्रक्रियार्स को बेच सकते हैं
- गवर्नमेंट फ़ायदे — कई स्कीम्स ख़ासली FPO के लिए हैं
- क्रेडिट एक्सेस — कलेक्टिव के तौर पर लोन मिलना आसान
गवर्नमेंट एक्टिवली FPO प्रमोट कर रही है। 10,000 नए FPO बनाने की स्कीम है, हर FPO को ₹18 लाख तक इक्विटी ग्रांट के साथ।
अगर इस चैप्टर से एक चीज़ लेकर जाओ: अगर तुम छोटे किसान हो, तो FPO ज्वाइन करो या बनाओ। अकेले, तुम एक छोटी आवाज़ हो भीड़ भरे बाज़ार में। साथ मिलकर, ताक़त से नेगोशिएट करते हो।
सीधा मार्केटिंग लाइसेंसेज़:
- कुछ स्टेट्स में किसान मंडी के बिना सीधे बेच सकते हैं
- उत्तराखंड में फ़ार्मर-टू-कंज़्यूमर सीधा सेल के प्रोविज़न्स हैं
- अपने लोकल एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से चेक करो
गवर्नमेंट स्कीम्स — खेती के लिए
एग्रीकल्चर के लिए गवर्नमेंट स्कीम्स किसी और सेक्टर से ज़्यादा हैं। चुनौती ढूँढना नहीं है — जानना है कि कौन सी रेलिवेंट है और असलीी एक्सेस कैसे करें।
सेंट्रल स्कीम्स
PM-KISAN:
- ₹6,000 सालाना, सीधे बैंक अकाउंट में, तीन इंस्टॉलमेंट्स
- सभी लैंडहोल्डिंग फ़ार्मर फ़ैमिलीज़ के लिए
- रजिस्ट्रेशन: pmkisan.gov.in या ग्राम पंचायत से
- तुम्हें पहले से मिलनी चाहिए। नहीं मिल रही तो अभी लागू करो।
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC):
- खेती के ख़र्चों के लिए सस्ता क्रेडिट — इंटरेस्ट रेट 4% (सब्सिडी के साथ)
- किसी भी बैंक से अवेलेबल
- क्रेडिट लिमिट लैंड होल्डिंग और फ़सल पर बेस्ड
- अलाइड एक्टिविटीज़ (डेयरी, पोल्ट्री, फ़िशरीज़) के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है
- किसान को मिलने वाला सबसे सस्ता लोन। समझदारी से इस्तेमाल करो।
PM फ़सल बीमा योजना (PMFBY):
- बहुत कम प्रीमियम पर क्रॉप इंश्योरेंस
- किसान का प्रीमियम: खरीफ़ 2%, रबी 1.5%, हॉर्टिकल्चर 5%
- बाक़ी गवर्नमेंट भरती है
- यील्ड घाटा, बुआई न हो पाना, हार्वेस्ट के बाद नुक़सान, लोकल आपदा — सब कवर
- हर सीज़न में कटऑफ़ डेट से पहले बैंक या CSC सेंटर से एनरोल करो
सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मेकेनाइज़ेशन (SMAM):
- फ़ार्म इक्विपमेंट पर सब्सिडी: 40-50% जनरल, SC/ST/छोटे किसानों के लिए 80% तक
- ट्रैक्टर, पावर टिलर, प्रक्रियािंग इक्विपमेंट कवर होते हैं
- स्टेट एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से लागू करो
उत्तराखंड-ख़ास सपोर्ट
हिल एग्रीकल्चर डेवलपमेंट स्कीम्स:
- सीढ़ीदार खेती, पहाड़ी सिंचाई के लिए स्पेशल सब्सिडीज़
- पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस कल्टिवेशन पर 50-80% सब्सिडी
- Uttarakhand Organic Commodity Board ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग प्रमोट करता है
कोल्ड स्टोरेज और प्रक्रियािंग सब्सिडीज़:
- PM किसान सम्पदा योजना: फ़ूड प्रक्रियािंग इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर सब्सिडी
- NHB (National Horticulture Board): कोल्ड स्टोरेज कंस्ट्रक्शन पर 35-40% सब्सिडी
- NABARD कोल्ड चेन प्रोजेक्ट्स के लिए रिफ़ाइनेंस
ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग इंसेंटिव्स:
- परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY): ऑर्गेनिक कन्वर्ज़न के लिए ₹50,000/हेक्टेयर, 3 साल में
- क्लस्टर-बेस्ड एप्रोच — ग्रुप में कन्वर्ट करो तो आसान
स्कीम्स कैसे एक्सेस करें: अपने नज़दीकी KVK (कृषि विज्ञान केंद्र), डिस्ट्रिक्ट एग्रीकल्चर दफ़्तर, या अच्छे CSC सेंटर जाओ। साथ रखो: ज़मीन के काग़ज़ात, आधार, बैंक पासबुक। पर्सिस्टेंट रहो — गवर्नमेंट स्कीम्स एग्ज़िस्ट करती हैं, लेकिन एक्सेस करने में पेशेंस और फ़ॉलो-अप चाहिए। प्रिया का ऐप भी करंट स्कीम्स लिस्ट करता है और लागू करने में मदद करता है।
कोल्ड चेन और स्टोरेज — चुपचाप मुनाफ़ा खाने वाला
"India इतना अनाज-फल-सब्ज़ी उगाता है कि हर नागरिक का पेट भर सके। लेकिन 30-40% फल-सब्ज़ियाँ कंज़्यूमर तक पहुँचने से पहले सड़ जाती हैं।" — ये किसी किताब का आँकड़ा नहीं, हल्द्वानी मंडी में किसी भी गर्मी की दोपहर चले जाओ तो दिख जाएगा: ज़्यादा पके आड़ू, कुचले टमाटर, कुचले क्रेट्स से बहता माल्टा का रस।
पोस्ट-हार्वेस्ट घाटा किसान की आमदनी का साइलेंट किलर है। उत्तराखंड में, जहाँ टेरेन की वजह से ट्रांसपोर्ट धीमा और कठिन है, नुक़सान और भी ज़्यादा हो सकता है।
छोटे किसान के लिए क्या यथार्थवादी है?
₹2 करोड़ की कोल्ड स्टोरेज फ़ैसिलिटी नहीं चाहिए। छोटे से शुरू करो:
- इवैपोरेटिव कूल चेंबर्स — ईंट, रेत, और पानी से बने आसान स्ट्रक्चर्स। ₹5,000-10,000 में बन जाते हैं। शेल्फ़ लाइफ़ 5-7 दिन बढ़ सकती है।
- शेयर्ड कोल्ड स्टोरेज — कई किसान मिलकर। 5 MT (मापदंड टन) का कोल्ड रूम ₹6-8 लाख में आता है। 10 किसानों में बाँटो — ₹60,000-80,000 प्रति किसान। गवर्नमेंट सब्सिडी 35-50% कवर कर सकती है।
- हार्वेस्ट टाइमिंग — कभी-कभी सबसे अच्छा कोल्ड स्टोरेज ये है कि फल तब तक मत तोड़ो जब तक बायर न मिले।
- प्रक्रियािंग — स्टोर नहीं कर सकते तो प्रक्रिया करो। पेरिशेबल सेब को नॉन-पेरिशेबल ड्राइड एप्पल चिप्स बना दो।
अलाइड बिज़नेसेज़ — खेत से आगे
एग्रीकल्चर सिर्फ़ फ़सल उगाना नहीं। कुछ सबसे फ़ायदेमंद एग्रीकल्चरल एक्टिविटीज़ खेत के बाहर होती हैं।
डेयरी फ़ार्मिंग
- उत्तराखंड की पहाड़ी नस्लें कम दूध देती हैं लेकिन ज़्यादा रिच, क्रीमी
- ताज़ा दूध लोकली बेचो, या घी, पनीर, दही बनाओ
- एक गाय 5 लीटर/दिन × ₹60/लीटर = ₹9,000/महीना
- वैल्यू ऐड: 1 kg घी बनाने में ~25 लीटर दूध लगता है। 25 लीटर × ₹60 = ₹1,500 दूध की वैल्यू। 1 kg घी बिकता है ₹600-800 (नियमित) या ₹1,200-1,500 (ब्रांडेड, A2 घी)। ब्रांडिंग मायने रखती है।
पोल्ट्री
- कड़कनाथ और लोकल पहाड़ी ब्रीड्स प्रीमियम दाम पर बिकती हैं
- ₹300-500 पर बर्ड (देसी/फ़्री-रेंज) vs ₹120-150 ब्रॉइलर
- फ़्री-रेंज अंडे: ₹10-15 प्रति vs ₹5-6 नियमित
- शुरुआती निवेश: 50-100 बर्ड्स, ₹30,000-50,000 से शुरू
ट्राउट फ़ार्मिंग
- उत्तराखंड उन गिने-चुने स्टेट्स में है जहाँ ट्राउट फ़ार्मिंग हो सकती है — ठंडा, साफ़, बहता पानी ज़रूरी
- रेनबो ट्राउट ₹800-1,200/kg में बिकती है
- गवर्नमेंट फ़िंगरलिंग्स और टेक्निकल सपोर्ट देती है
- फ़्लोइंग वॉटर और ख़ास टेम्प्रेचर (10-18°C) चाहिए
- हर जगह मुमकिन नहीं, लेकिन जहाँ है वहाँ बहुत फ़ायदेमंद
मधुमक्खी पालन
- मल्टी-फ़्लोरा हिमालयन हनी प्रीमियम उत्पाद है
- निवेश: ₹5,000-8,000 पर कॉलोनी (बॉक्स)। 10 कॉलोनीज़ से शुरू करो: ₹50,000-80,000
- हर कॉलोनी 15-25 kg शहद पर ईयर
- मार्केट दाम: ₹400-800/kg (स्वाभाविक, अनप्रक्रिया्ड हिल हनी)
- बीज़वैक्स, पॉलन, प्रोपोलिस से अतिरिक्त आमदनी
- KVK से गवर्नमेंट प्रशिक्षण अवेलेबल
सेरीकल्चर (रेशम उत्पादन)
- उत्तराखंड में बाँज के जंगल — तसर सिल्क के लिए आइडियल
- सेरीकल्चर सीधाोरेट प्रमोट करती है
- खेती के साथ सप्लीमेंटरी आमदनी
एग्री-टूरिज़्म (फ़ार्म चरण़)
- खेत को टूरिज़्म से जोड़ो — विज़िटर्स को ग्रामीण जीवन का अनुभव दो
- नीमा और ज्योति मुनस्यारी से पहले से ये कर रही हैं: मेहमान सेब तोड़ते हैं, गाय दुहते हैं, लोकल खाना बनाते हैं
- वर्किंग फ़ार्म जो विज़िटर्स को भी होस्ट करे — एग्रीकल्चर और हॉस्पिटैलिटी दोनों से कमाई
- बढ़ता सेगमेंट — शहरी परिवार "असली" अनुभव चाहते हैं, सिर्फ़ होटल रूम नहीं
ऑर्गेनिक सर्टिफ़िकेशन — क्या पैसा लगाने लायक़ है?
"ऑर्गेनिक" आज के मार्केट में ताक़तवर वर्ड है। अर्बन कंज़्यूमर्स 20-40% ज़्यादा देते हैं ऑर्गेनिक के लिए। लेकिन सर्टिफ़िकेशन फ़्री नहीं — रियल लागतें हैं।
दो रास्ते
रास्ता 1: NPOP (National Programme for Organic Production)
- फ़ुल थर्ड-पार्टी सर्टिफ़िकेशन
- एक्सपोर्ट और "India Organic" लोगो इस्तेमाल करने के लिए ज़रूरी
- लागत: ₹15,000-30,000 पर ईयर (ग्रुप सर्टिफ़िकेशन सस्ती)
- 2-3 साल कन्वर्ज़न पीरियड — ऑर्गेनिकली फ़ार्मिंग करो लेकिन सर्टिफ़ाइड ऑर्गेनिक नहीं बेच सकते
- सालाना इंस्पेक्शन
रास्ता 2: PGS-India (Participatory Guarantee System)
- पीयर-बेस्ड सर्टिफ़िकेशन — ग्रुप में किसान एक-दूसरे को वेरिफ़ाई करते हैं
- बहुत सस्ता: ₹1,000-3,000 पर फ़ार्मर पर ईयर
- डोमेस्टिक सेल्स के लिए स्वीकारेड (एक्सपोर्ट के लिए नहीं)
- FSSAI ऑर्गेनिक लेबलिंग के लिए रिकग्नाइज़्ड
- लोकली या डोमेस्टिक मार्केट में बेचने वाले छोटे किसानों के लिए आइडियल
मैथ: क्या ऑर्गेनिक सर्टिफ़िकेशन वर्थ है?
रावत जी के 1 एकड़ बग़ीचे के नंबर्स:
| कन्वेंशनल | ऑर्गेनिक (PGS सर्टिफ़ाइड) | |
|---|---|---|
| पैदावार पर एकड़ | 3,000 kg | 2,400 kg (शुरू में 20% कम) |
| बिक्री रेट | ₹35/kg | ₹55/kg (ऑर्गेनिक प्रीमियम) |
| राजस्व | ₹1,05,000 | ₹1,32,000 |
| इनपुट लागतें | ₹25,000 (केमिकल खाद, कीटनाशक) | ₹15,000 (ऑर्गेनिक इनपुट्स — अक्सर सस्ते) |
| सर्टिफ़िकेशन लागत | ₹0 | ₹2,000 (PGS) |
| बाक़ी लागतें | ₹85,000 | ₹85,000 |
| कुल ख़र्चा | ₹1,10,000 | ₹1,02,000 |
| मुनाफ़ा | -₹5,000 | ₹30,000 |
यील्ड कम होती है, लेकिन प्रीमियम दाम और कम इनपुट लागतें ज़्यादा कम्पेंसेट करते हैं। और उत्तराखंड में कई पहाड़ी किसान पहले से मिनिमल केमिकल्स इस्तेमाल करते हैं — कन्वर्ज़न मैदानों से आसान है।
रियलिटी चेक: ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग सबसे अच्छी तब काम करती है जब सीधा-टू-कंज़्यूमर सेलिंग के साथ हो। अगर ऑर्गेनिक माल नियमित मंडी में नियमित रेट पर बेचोगे, तो ऑर्गेनिक इनपुट्स की लागत बेयर करोगे लेकिन प्रीमियम नहीं मिलेगा। ऐसे बायर्स ढूँढो जो ऑर्गेनिक को वैल्यू करें और उसके लिए पे करें।
चुनौतियाँ और हक़ीक़त — ईमानदारी से बात करें
ये चैप्टर ज़िम्मेदार नहीं होगा अगर सिर्फ़ अच्छी तस्वीर दिखाए। उत्तराखंड में पहाड़ी खेती को सच में गंभीर चुनौतियाँ फ़ेस करनी पड़ती हैं, और कोई भी ईमानदार किताब इन्हें एकनॉलेज करेगी।
मौसम पर निर्भरता
सब कुछ बिल्कुल सही प्लान करो और एक ओलावृष्टि अप्रैल में सीज़न की सेब की फ़सल तबाह कर सकती है। क्लाइमेट बदलाव मौसम को और अनप्रिडिक्टेबल बना रहा है — बेमौसम बारिश, देर से सर्दी, गर्म गर्मियाँ। एप्पल बेल्ट ऊपर खिसक रहा है। जो वैराइटीज़ 1,500 मीटर पर उगती थीं, अब 2,000 मीटर चाहिए।
क्रॉप इंश्योरेंस (PMFBY) मदद करती है, लेकिन पूरे साल की आमदनी रिप्लेस नहीं कर सकती।
पानी की कमी
नदियाँ होने के बावजूद, कई पहाड़ी गाँवों में पानी का गंभीर संकट है। नौले-धारे सूख रहे हैं। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। इरिगेशन इन्फ़्रास्ट्रक्चर कमज़ोर है। ये सीधे लिमिट करता है कि क्या उगा सकते हो और कितना।
जंगली जानवर — अनकही क्राइसिस
पहाड़ी किसानों की शायद सबसे इमोशनली ड्रेनिंग समस्या:
- बंदर — पूरी फ़्रूट हार्वेस्ट घंटों में तबाह कर देते हैं
- जंगली सूअर — रातोंरात फ़सल उखाड़ देते हैं
- तेंदुए — मवेशी मार देते हैं
- हिरण और साही — सब्ज़ियाँ बर्बाद करते हैं
किसान रात-रात जागकर खेत की रखवाली करते हैं। कुछ ने खेती ही छोड़ दी है क्योंकि जानवर जितना बचा सकते हैं उससे ज़्यादा तबाह कर देते हैं। गवर्नमेंट कम्पेंसेशन अपर्याप्त और धीमा। फ़ेंसिंग महँगी। ये छोटी समस्या नहीं है — कई गाँवों में यही वजह है कि लोगों ने खेती बंद कर दी।
इसका कोई आसान सोल्यूशन है, ये प्रिटेंड नहीं करेंगे। ये डीप, सिस्टेमिक इश्यू है जिसमें पॉलिसी, वाइल्डलाइफ़ प्रबंधन, और कम्युनिटी-लेवल सुरक्षा चाहिए। इंडिविजुअल किसान क्या कर सकते हैं: सोलर फ़ेंसिंग (सब्सिडी अवेलेबल), ऐसी फ़सलें उगाओ जो जानवर नहीं खाते (मेडिसिनल हर्ब्स, फूल), और विलेज-लेवल सुरक्षा के लिए मिलकर काम करो।
नौजवानों का पलायन
नौजवान गाँवों से शहरों की तरफ़ जा रहे हैं — पढ़ाई, नौकरी, और ऐसी ज़िंदगी के लिए जिसमें पहाड़ी खेती की तोड़-मरोड़ वाली मेहनत और अनिश्चितता न हो। ये रैशनल है। किसी को गिल्ट-ट्रिप नहीं करना चाहिए।
लेकिन इसका मतलब है कि फ़ार्मिंग पॉपुलेशन बूढ़ी हो रही है। इंडियन फ़ार्मर की एवरेज उम्र 50+ है। 20 साल बाद ये ज़मीनें कौन जोतेगा?
जवाब ये नहीं है कि "नौजवानों को गाँव में रहना चाहिए।" जवाब ये है: खेती को इतना फ़ायदेमंद और इतना डिग्निफ़ाइड बनाओ कि रुकना चॉइस हो, सैक्रिफ़ाइस नहीं।
वैल्यू एडिशन, सीधा सेलिंग, टेक्नोलॉजी, और कलेक्टिव एक्शन यही कर सकते हैं। सबके लिए नहीं, लेकिन काफ़ी लोगों के लिए ताकि पहाड़ ज़िंदा रहें।
क्लाइमेट बदलाव और एप्पल बेल्ट का खिसकना
रावत जी ने ख़ुद देखा है। सर्दियाँ छोटी हो रही हैं। बर्फ़ कम पड़ रही है। एप्पल ट्रीज़ को फ़्रूट लगने के लिए जो "चिलिंग आवर्स" चाहिए, वो घट रहे हैं। कुछ बग़ीचे जो 15 साल पहले भरपूर प्रोड्यूस देते थे, अब एवरेज हार्वेस्ट देते हैं।
एडैप्टेशन:
- लो-चिल एप्पल वैराइटीज़ (Anna, Dorset Golden) नीची ऊँचाइयों के लिए
- वॉर्मिंग क्लाइमेट में बेहतर फ़सलों की तरफ़ — कीवी, एवोकाडो, अनार
- वॉटर हार्वेस्टिंग और माइक्रो-इरिगेशन — कम बारिश में सँभालना
- एग्रोफ़ॉरेस्ट्री — पेड़, फ़सल, और मवेशी मिलाकर रेज़िलिएंस बढ़ाना
रावत जी का प्लान — कमोडिटी सेलर से ब्रांड बिल्डर तक
कई बातचीत के बाद — कुछ चाय पीते हुए, कुछ बग़ीचे में चलते हुए — रावत जी ने एक प्लान बनाया। फ़ैंसी प्रोजेक्शन्स वाला बिज़नेस प्लान नहीं, बल्कि अगले तीन साल का व्यावहारिक रोडमैप।
साल 1: नंबर्स जानो, बुनियादी्स ठीक करो
- पर kg लागत ऑफ़ प्रोडक्शन एग्ज़ैक्टली गणना करो (हो गया — आँखें खुल गईं)
- सेब ग्रेड करो: A, B, C. ग्रेड A सीधे बेचो, ग्रेड B मंडी से, ग्रेड C प्रक्रियािंग के लिए
- लोकल FPO ज्वाइन करो (कुमाऊँ एप्पल ग्रोअर्स FPO)
- प्रिया के ऐप पर रजिस्टर करो। छोटे से शुरू — 500 kg सीधा बेचो
- PGS ऑर्गेनिक सर्टिफ़िकेशन शुरू करो (बग़ीचे में पहले से मिनिमल केमिकल्स)
साल 2: वैल्यू ऐड करो, चैनल्स बढ़ाओ
- छोटी प्रक्रियािंग यूनिट: एप्पल जूस और ड्राइड एप्पल चिप्स
- प्रक्रिया्ड उत्पाद के लिए FSSAI रजिस्ट्रेशन
- ब्रांड नेम: "Rawat's Ranikhet Orchards" — आसान, ऑनेस्ट, प्लेस-बेस्ड
- प्रिया का ऐप, WhatsApp सीधा, देहरादून के ऑर्गेनिक बाज़ार से बेचो
- अंकिता से साझेदारी एक्सप्लोर करो — वो D2C ब्रांडिंग जानती है
साल 3: स्केल और सस्टेन
- प्रक्रियािंग बढ़ाओ: एप्पल साइडर विनेगर और फ़्रूट प्रिज़र्व
- FPO के ज़रिए दूसरे किसानों का प्रोड्यूस भी एग्रीगेट करो — प्रक्रियािंग हब बनो
- ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स टारगेट करो: Amazon Fresh, BigBasket
- छोटा कोल्ड स्टोरेज लगाओ (NHB सब्सिडी के साथ)
3 साल में कुल एडिशनल निवेश: लगभग ₹3-4 लाख (पार्शियली गवर्नमेंट सब्सिडीज़ से)
अपेक्षित आउटकम: पर एकड़ राजस्व ₹1,05,000 (सब मंडी) से बढ़कर ₹2,50,000-3,00,000 (सीधा सेल + प्रक्रिया्ड उत्पाद + मंडी मिक्स)।
ये ख़्वाब नहीं है। हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के किसान ये पहले से कर रहे हैं। इन्फ़्रास्ट्रक्चर और मार्केट एक्सेस बेहतर हो रहे हैं। गैप है नॉलेज और आत्मविश्वास का — और यही इस किताब का मक़सद है।
कम्युनिटी फ़ार्मिंग — अकेले नहीं करना है
पूरे उत्तराखंड में छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट्स दिखा रहे हैं कि क्या मुमकिन है:
- वन पंचायत कलेक्टिव फ़ार्मिंग — कम्युनिटीज़ मिलकर फ़ॉरेस्ट प्रोड्यूस (तेजपत्ता, रिंगाल, हर्ब्स) मैनेज करती हैं और साथ बेचती हैं
- महिला SHG अचार और प्रिज़र्व यूनिट्स चलाती हैं — कई डिस्ट्रिक्ट्स में महिला मंगल दल ग्रुप्स
- यूथ-रन एग्री-स्टार्टअप्स — शहरों से मार्केट नॉलेज और टेक्नोलॉजी लेकर लौटे नौजवान, गाँव का प्रोड्यूस शहरी मार्केट्स से कनेक्ट कर रहे हैं
- विलेज-लेवल माइक्रो-प्रक्रियािंग यूनिट्स — छोटे जूस प्लांट्स, ड्राइंग यूनिट्स, हनी प्रक्रियािंग सेंटर्स — NABARD या गवर्नमेंट सपोर्ट से
नीमा और ज्योति ने मुनस्यारी में कुछ इंटरेस्टिंग शुरू किया है। उनके होमस्टे गेस्ट्स को लोकल राजमा, ताज़ा शहद, और घर का बना अचार बहुत पसंद आया। तो उन्होंने साइड बिज़नेस शुरू किया — इन उत्पाद की पैकेजिंग और सेलिंग। गाँव के किसानों से ख़रीदती हैं (फ़ेयर दाम, समय पर पेमेंट), पैकेजिंग और ब्रांडिंग ऐड करती हैं, और होमस्टे से, WhatsApp से, और नैनीताल के फ़ार्मर मार्केट्स में बेचती हैं। छोटा है, लेकिन इसने गाँव का प्रोड्यूस देखने का नज़रिया बदल दिया — ये जीवित रहना फ़ूड नहीं है, ये उत्पाद हैं जिनके लिए लोग अच्छा पैसा देंगे।
व्यावहारिक चेकलिस्ट
अगर तुम किसान हो या एग्रीकल्चर-रिलेटेड बिज़नेस शुरू करने की सोच रहे हो:
- पर यूनिट लागत ऑफ़ प्रोडक्शन गणना करो (पर kg, पर लीटर, पर पीस)
- अपने प्रोड्यूस के लिए कम से कम एक वैल्यू एडिशन पॉसिबिलिटी आइडेंटिफ़ाई करो
- प्रक्रिया्ड फ़ूड बेचना है तो FSSAI रजिस्ट्रेशन करो
- अपने इलाक़ा में FPO ज्वाइन करो या बनाओ
- eNAM और कम से कम एक सीधा-सेलिंग प्लेटफ़ॉर्म पर रजिस्टर करो
- PM-KISAN मिल रही है कि नहीं चेक करो (एलिजिबल हो तो)
- किसान क्रेडिट कार्ड बनवाओ — सबसे सस्ता क्रॉप क्रेडिट
- PMFBY में क्रॉप इंश्योरेंस के लिए एनरोल करो
- नज़दीकी KVK जाओ — टेक्निकल गाइडेंस और स्कीम इन्फ़ॉर्मेशन के लिए
- एक आसान नोटबुक शुरू करो — हर आमदनी और ख़र्चा ट्रैक करो, हर रुपया
आगे क्या
एग्रीकल्चर और फ़ूड डीपली कनेक्टेड हैं — लेकिन प्रोड्यूस लेकर रेस्टोरेंट, क्लाउड किचन, पैकेज्ड फ़ूड ब्रांड, या कैटरिंग बिज़नेस बनाना एक अलग गेम है, अलग नियम के साथ।
अगले चैप्टर में फ़ूड और रेस्टोरेंट बिज़नेस देखेंगे — जहाँ अंकिता का पहाड़ी अचार ग्राहक की प्लेट तक पहुँचता है, और जहाँ मार्जिन्स पतले हैं लेकिन अवसरज़ बहुत बड़ी हैं अगर संचालन सही हों।
रावत जी शाम की रोशनी में अपने बग़ीचे में खड़े हैं, पहाड़ सुनहरे हो रहे हैं। अभी-अभी प्रिया से फ़ोन पर बात हुई — आने वाले सीज़न का पहला सीधा ऑर्डर। तीस बॉक्सेज़ ग्रेड A सेब, Gurgaon के एक ऑर्गेनिक स्टोर में डिलीवरी। ₹80/kg। दिमाग़ में हिसाब लगाते हैं और मुस्कुराते हैं। रातोंरात सब नहीं बदलेगा। लेकिन 18 साल में पहली बार, उन्हें अपने नंबर्स पता हैं। और जानना — शुरुआत है।