अकाउंटिंग

गैस स्टोव के बगल वाली नोटबुक

ऋषिकेश में त्रिवेणी घाट के पास शनिवार की गर्म दोपहर है। लंच रश ख़त्म हो चुका है, पुष्पा दीदी काउंटर साफ़ कर रही हैं। उनके चाय-मैगी स्टॉल पर बस दो कॉलेज के बच्चे एक प्लेट मैगी शेयर कर रहे हैं और एक कोने में एक साधु बाबा चाय पी रहे हैं।

उनका भतीजा अर्जुन देहरादून से वीकेंड पर आया है। B.Com सेकंड ईयर में है, और उसमें वो ख़ास ऊर्जा है — जो कॉलेज में कुछ नया सीखकर पूरी दुनिया को सिखाना चाहता है।

वो गैस स्टोव के बगल में पड़ी पुरानी स्पाइरल नोटबुक उठाता है। चाय और दाल के दाग़ लगे हैं, भाप से पेजेज़ सिकुड़े हुए हैं। हर पेज का फ़ॉर्मेट वही है: ऊपर डेट, बाईं तरफ़ उस दिन क्या ख़र्च हुआ, दाईं तरफ़ क्या कमाया।

"दीदी, ये तो आप बहुत अच्छा कर रही हो," अर्जुन पेजेज़ पलटते हुए बोलता है। "लेकिन आप आधा ही काम कर रही हैं।"

"आधा? मैं तो सब लिखती हूँ — हर रुपया अंदर, हर रुपया बाहर। क्या मिसिंग है?"

अर्जुन कुर्सी खींचता है। "दिखाता हूँ।"

यहीं से हमारा अकाउंटिंग का सफ़र शुरू होता है। क्योंकि एक सच है जो कोई स्मॉल बिज़नेस ओनर्स को नहीं बताता: आप पहले से ही अकाउंटिंग कर रहे हैं। जब भी आप लिखते हैं कि क्या ख़र्च हुआ और क्या कमाया, तो बुक्स रख रहे हैं। सवाल ये है कि इतने अच्छे से रख रहे हैं कि उनसे कुछ काम का निकाल सकें?

अकाउंटिंग सज़ा नहीं है। ये सरकार का ज़बरदस्ती का काम नहीं है (हाँ, कुछ हद तक है — लेकिन वो टैक्सेशन है, अलग चैप्टर)। अकाउंटिंग एक भाषा है — जिसमें आपका बिज़नेस आपको बताता है कि उसकी असली हालत क्या है।

और अगर ये भाषा पढ़नी नहीं आती, तो आप अंधेरे में तीर चला रहे हैं।

हर बिज़नेस को बुक्स क्यों रखनी चाहिए

सबसे बुनियादी सवाल: करें ही क्यों?

पुष्पा दीदी सालों से बिना "सही" अकाउंटिंग के स्टॉल चला रही हैं। उन्हें अंदाज़ा है कितना कमाती हैं। पता है कब बिज़नेस अच्छा चलता है, कब स्लो। तो और क्या चाहिए?

ये चाहिए:

1. आपको लगता है मुनाफ़ा पता है। शायद ग़लत है।

पुष्पा दीदी को लगता है महीने में ₹15,000-20,000 मुनाफ़ा है। लेकिन जब अर्जुन ने तीन महीने की एंट्रीज़ जोड़ीं, तो असली नंबर ₹12,000 के क़रीब निकला। क्यों? क्योंकि उन्होंने ₹500 नए कप्स वाला ख़र्चा नहीं गिना, ₹1,200 गैस रेगुलेटर की रिपेयर का भूल गईं, ₹300 इलेक्ट्रीशियन को दिए वो काउंट नहीं किए। छोटे-छोटे ख़र्चे जो "बिज़नेस ख़र्चा" नहीं लगते, लेकिन हैं।

2. समस्याएँ जल्दी नहीं दिखतीं।

अगर दूध का दाम ₹2 पर लीटर तीन महीने पहले बढ़ा और आपने ट्रैक नहीं किया, तो रोज़ ₹60-80 चुपचाप एक्स्ट्रा जा रहे हैं। तीन महीने में ₹5,400-7,200। असली पैसा है।

3. बिना बुक्स के लोन नहीं मिलता।

बैंक और NBFCs नंबर्स देखना चाहते हैं। आपका अंदाज़ा नहीं — असली नंबर्स। बुक्स नहीं, लोन नहीं। इतना सिंपल है।

4. टैक्स फ़ाइलिंग नाइटमेयर बन जाती है।

GST फ़ाइलिंग का वक़्त आए या CA आमदनी-ख़र्चा माँगे, तो रिसीट्स का ढेर और याददाश्त पर निर्भर करना — ये ठीक नहीं है। टैक्सेशन अलग चैप्टर है, लेकिन अच्छी अकाउंटिंग से टैक्स फ़ाइलिंग आसान हो जाती है।

5. फ़्यूचर प्लान नहीं कर सकते।

मददर रखें? बेहतर जगह लें? एक्सपैंड करें? इन सवालों का जवाब बिना एग्ज़ैक्ट फ़ाइनेंशियल पोज़ीशन जाने कैसे दोगे? गट फ़ीलिंग तब तक काम करती है जब तक काम करती है।

भंडारी अंकल ने ये मुश्किल तरीक़े से सीखा। पहले दस साल हार्डवेयर की दुकान का हिसाब दिमाग़ में रखा। बिज़नेस फ़ायदेमंद था — महीने के अंत में ड्रॉअर में पैसे होते थे। फिर एक साल उन्हें पता चला कि कॉन्ट्रैक्टर्स को ₹2.8 लाख क्रेडिट दिया था — और उसमें से ₹90,000 छह महीने से ज़्यादा पुराना था, वापस आने का कोई साइन नहीं। ट्रैक नहीं किया था। वो ₹90,000 जो मुनाफ़ा समझ रहे थे, असल में डूब गया।

"तब से मैंने रजिस्टर में सब लिखा," वो अब बोलते हैं। "जो लिखा नहीं, वो भूल गया — और जो भूल गया, वो डूब गया।"

सिंगल एंट्री बनाम डबल एंट्री

वापस पुष्पा दीदी के स्टॉल पर। अर्जुन नोटबुक देख रहा है। एक टिपिकल दिन कुछ ऐसा दिखता है:

डेट: 15 जनवरी

ख़र्चा:                 कमाई:
दूध 5L     ₹310        चाय (85 कप्स)     ₹1,700
चीनी 2kg   ₹90         मैगी (22 प्लेट्स)  ₹2,200
पत्ती      ₹150        ब्रेड ऑमलेट       ₹600
मैगी पैकेट  ₹480        बिस्कुट वग़ैरह     ₹350
अंडे 30    ₹210
ब्रेड      ₹60
गैस रिफ़िल  ₹950
मददर     ₹200

कुल:       ₹2,450      कुल:              ₹4,850

"दीदी, इसे सिंगल एंट्री बुककीपिंग बोलते हैं," अर्जुन समझाता है। "आप हर ट्रांज़ैक्शन का एक साइड दर्ज कर रही हैं — या तो पैसा आया, या पैसा गया। सिंपल है, और छोटे बिज़नेस के लिए काम चलता है।"

सिंगल एंट्री मतलब पैसे की डायरी। पैसा आया? लिखो। पैसा गया? लिखो। दिन के अंत में कमाई में से ख़र्चा घटाओ। बस।

सिंगल एंट्री के फ़ायदे:

  • बिल्कुल सिंपल
  • कोई भी कर सकता है
  • बहुत छोटे बिज़नेस के लिए काफ़ी
  • कुछ न करने से बहुत बेहतर

सिंगल एंट्री की कमियाँ:

  • पूरी पिक्चर नहीं दिखाता
  • किसने आपको पैसे देने हैं, आपने किसे देने हैं — ये ट्रैक नहीं होता
  • आपके एसेट्स (स्टोव, टेबल्स, भंडार) ट्रैक नहीं होते
  • त्रुटियाँ पकड़ना मुश्किल
  • बैंक या ऑडिटर इससे ख़ुश नहीं होगा

"तो दूसरा तरीक़ा क्या है?" पुष्पा दीदी पूछती हैं।

"डबल एंट्री," अर्जुन बोलता है। "हर ट्रांज़ैक्शन दो बार रिकॉर्ड होता है — एक बार डेबिट, एक बार क्रेडिट। सुनने में पेचीदा लगता है, लेकिन लॉजिक बड़ा शानदार है।"

डबल एंट्री — 500 साल पुराना सिस्टम जो पूरी दुनिया चलाता है

डबल एंट्री बुककीपिंग 1494 में एक इटैलियन मैथमैटिशियन लूका पैसिओली ने फ़ॉर्मलाइज़ किया था। दुनिया का हर बिज़नेस — पुष्पा दीदी के चाय स्टॉल से लेकर रिलायंस उद्योगों तक — ये सिस्टम इस्तेमाल करता है (या करना चाहिए)।

कोर आइडिया: हर ट्रांज़ैक्शन कम से कम दो अकाउंट्स को असर डालता है।

जब पुष्पा दीदी ₹310 का दूध ख़रीदती हैं:

  • उनका कैश ₹310 से कम हुआ (जेब से पैसा गया)
  • उनकी सप्लाइज़ ₹310 से बढ़ी (दूध आ गया चाय बनाने के लिए)

जब 85 कप्स चाय बेचती हैं ₹1,700 में:

  • उनका कैश ₹1,700 से बढ़ा (पैसा आया)
  • उनकी राजस्व ₹1,700 से बढ़ी (आमदनी हुई)

दो एंट्रीज़। हर बार। इसलिए डबल एंट्री बोलते हैं।

"लेकिन इतनी मेहनत क्यों?" पुष्पा दीदी पूछती हैं।

"क्योंकि ये बैलेंस करता है," अर्जुन समझाता है। "अगर हर ट्रांज़ैक्शन में दो बराबर एंट्रीज़ हैं — एक इधर, एक उधर — तो दिन के अंत में कुल डेबिट्स और कुल क्रेडिट्स बराबर होने चाहिए। अगर नहीं हैं, तो कहीं ग़लती है। ये बिल्ट-इन त्रुटि-चेकिंग सिस्टम है।"

अभी के लिए: अगर बहुत छोटा बिज़नेस है — एक स्टॉल, फ़्रीलांस काम, छोटी दुकान — तो सिंगल एंट्री से शुरू करो। जैसे बिज़नेस बढ़े, डबल एंट्री ज़रूरी हो जाता है। और अगर अकाउंटिंग सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करते हो (टैली, ज़ोहो बुक्स, खाताबुक — बाद में बात करेंगे), तो सॉफ़्टवेयर ख़ुद डबल एंट्री कर देता है। बस ट्रांज़ैक्शन डालो, दोनों साइड्स अपने-आप सँभालना हो जाती हैं।

डेबिट और क्रेडिट — दो वर्ड्स जो सबको कन्फ़्इस्तेमाल करते हैं

यहीं से लोगों की आँखें बंद होने लगती हैं। डेबिट। क्रेडिट। कौन सा क्या है? "डेबिट" कभी पैसा आना क्यों बोलते हैं, कभी जाना?

चलिए सिंपल करते हैं।

जो भी आपको बैंक स्टेटमेंट से डेबिट-क्रेडिट के बारे में पता है — भूल जाइए। बैंक स्टेटमेंट में "क्रेडिट" मतलब आपके अकाउंट में पैसा आया, "डेबिट" मतलब गया। ये बैंक का नज़रिया है, आपका नहीं। अकाउंटिंग में ये अलग काम करता है।

नियम ये है:

डेबिट (Dr)क्रेडिट (Cr)
एसेट्स (कैश, भंडार, इक्विपमेंट)बढ़ता हैघटता है
ख़र्चे (रेंट, सप्लाइज़, तनख़्वाह)बढ़ता हैघटता है
लायबिलिटीज़ (लोन्स, उधार)घटता हैबढ़ता है
राजस्व (सेल्स, आमदनी)घटता हैबढ़ता है
ओनर्स इक्विटी (बिज़नेस में आपका पैसा)घटता हैबढ़ता है

ये टेबल डरावना लगता है। चाय की दुकान की भाषा में ट्रांसलेट करते हैं।

जब पैसा बिज़नेस में आता है:

  • कैश (एसेट) बढ़ता है → ये कैश का डेबिट है
  • राजस्व बढ़ती है → ये राजस्व का क्रेडिट है

एग्ज़ांपल: पुष्पा दीदी ने ₹1,700 की चाय बेची।

  • डेबिट: कैश ₹1,700 (एसेट बढ़ा)
  • क्रेडिट: सेल्स राजस्व ₹1,700 (आमदनी बढ़ी)

जब पैसा बिज़नेस से बाहर जाता है:

  • कैश (एसेट) घटता है → ये कैश का क्रेडिट है
  • ख़र्चा बढ़ता है → ये ख़र्चा का डेबिट है

एग्ज़ांपल: पुष्पा दीदी ने ₹310 का दूध ख़रीदा।

  • डेबिट: सप्लाइज़ ख़र्चा ₹310 (ख़र्चा बढ़ा)
  • क्रेडिट: कैश ₹310 (एसेट घटा)

गोल्डन नियम: कुल डेबिट्स = कुल क्रेडिट्स। हमेशा।

अर्जुन एक काग़ज़ पर सिंपल T बनाता है। "हर अकाउंट को ऐसा T-शेप समझो। बायाँ साइड डेबिट, दायाँ साइड क्रेडिट। पैसा एक T से दूसरे T में जाता है। ग़ायब कभी नहीं होता — बस मूव करता है।"

पुष्पा दीदी एक पल देखती हैं। "मतलब पानी जैसा? ग़ायब नहीं होता, एक बाल्टी से दूसरी में जाता है?"

"बिल्कुल, दीदी। बिल्कुल।"

अगर अभी पूरा समझ नहीं आया तो कोई बात नहीं। थोड़ी अभ्यास लगती है। अच्छी बात ये है कि अगर कोई अकाउंटिंग सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करते हो, तो बस ट्रांज़ैक्शन डालो (दूध ख़रीदा, ₹310, कैश दिया) — सॉफ़्टवेयर डेबिट-क्रेडिट ख़ुद सँभालता है। लेकिन कॉन्सेप्ट समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि बाद में अपने अकाउंट्स पढ़ सको।

जर्नल, लेजर, ट्रायल बैलेंस — तीन चरण

अब डेबिट-क्रेडिट समझ लिया, तो देखते हैं कि ट्रांज़ैक्शंस अकाउंटिंग सिस्टम में कैसे फ़्लो करते हैं। तीन चरणेज़ हैं:

चरण 1: जर्नल (रोज़ की डायरी)

जर्नल में हर ट्रांज़ैक्शन पहले रिकॉर्ड होता है, जिस ऑर्डर में हुआ। सोचो — बिज़नेस डे का "रॉ लॉग"।

पुष्पा दीदी का 15 जनवरी का जर्नल कुछ ऐसा दिखेगा:

डेटडिस्क्रिप्शनडेबिट (₹)क्रेडिट (₹)
15 जनकैश (चाय बेची, 85 कप्स)1,700
सेल्स राजस्व1,700
15 जनकैश (मैगी बेची, 22 प्लेट्स)2,200
सेल्स राजस्व2,200
15 जनकैश (ब्रेड ऑमलेट + बिस्कुट)950
सेल्स राजस्व950
15 जनसप्लाइज़ ख़र्चा (दूध)310
कैश310
15 जनसप्लाइज़ ख़र्चा (चीनी)90
कैश90
15 जनसप्लाइज़ ख़र्चा (पत्ती)150
कैश150
15 जनसप्लाइज़ ख़र्चा (मैगी पैकेट्स)480
कैश480
15 जनसप्लाइज़ ख़र्चा (अंडे)210
कैश210
15 जनसप्लाइज़ ख़र्चा (ब्रेड)60
कैश60
15 जनगैस ख़र्चा950
कैश950
15 जनवेजेज़ ख़र्चा (मददर)200
कैश200

हर ट्रांज़ैक्शन: एक डेबिट, एक क्रेडिट। जर्नल सब दर्ज करता है।

चरण 2: लेजर (अकाउंट-वाइज़ व्यवस्थित्ड)

जर्नल डेट-वाइज़ है। लेकिन अगर जानना हो: "इस महीने सप्लाइज़ पर कितना ख़र्च हुआ?" या "जनवरी की कुल राजस्व क्या है?"

तो लेजर चाहिए। लेजर सारी जर्नल एंट्रीज़ को अकाउंट-वाइज़ व्यवस्थित करता है।

कैश अकाउंट (लेजर)

डेटडिस्क्रिप्शनडेबिट (₹)क्रेडिट (₹)बैलेंस (₹)
15 जनचाय सेल्स1,7001,700
15 जनमैगी सेल्स2,2003,900
15 जनबाक़ी सेल्स9504,850
15 जनदूध3104,540
15 जनचीनी904,450
15 जनपत्ती1504,300
15 जनमैगी पैकेट्स4803,820
15 जनअंडे2103,610
15 जनब्रेड603,550
15 जनगैस9502,600
15 जनमददर वेजेज़2002,400

अब दिख रहा है: पुष्पा दीदी ने ₹4,850 कमाए, ₹2,450 ख़र्च किए, ₹2,400 कैश बचा।

सप्लाइज़ ख़र्चा अकाउंट (लेजर)

डेटडिस्क्रिप्शनडेबिट (₹)बैलेंस (₹)
15 जनदूध310310
15 जनचीनी90400
15 जनपत्ती150550
15 जनमैगी पैकेट्स4801,030
15 जनअंडे2101,240
15 जनब्रेड601,300

आज का कुल सप्लाइज़ ख़र्चा: ₹1,300। सिंपल।

जर्नल बताता है क्या हुआ। लेजर बताता है हर अकाउंट कैसा दिखता है

चरण 3: ट्रायल बैलेंस (सैनिटी चेक)

किसी पीरियड के अंत में — हफ़्ता हो, महीना हो, साल हो — ट्रायल बैलेंस बनाते हैं। सारे लेजर अकाउंट्स की लिस्ट, डेबिट और क्रेडिट कॉलम्स में।

ट्रायल बैलेंस — 15 जनवरी (एक दिन, सिम्प्लीफ़ाइड)

अकाउंटडेबिट (₹)क्रेडिट (₹)
कैश2,400
सेल्स राजस्व4,850
सप्लाइज़ ख़र्चा1,300
गैस ख़र्चा950
वेजेज़ ख़र्चा200
कुल4,8504,850

दोनों कुल्स मैच कर रहे हैं। बुक्स बैलेंस्ड हैं। अगर मैच नहीं करते, तो कहीं ग़लती है — ढूँढो।

"ऐसे समझो, दीदी," अर्जुन बोलता है। "जर्नल आपकी रॉ डायरी है। लेजर व्यवस्थित्ड फ़ाइलिंग कैबिनेट है। और ट्रायल बैलेंस ये चेक करना है कि कोई फ़ैसला लेने से पहले सब जुड़ रहा है।"

पुष्पा दीदी हाँ करती हैं। "जैसे ड्रॉअर का कैश नोटबुक से मैच करना।"

"बिल्कुल। और अगर ड्रॉअर में नंबर और नोटबुक में नंबर अलग हों?"

"तो कुछ ग़लत है। या तो लिखने में ग़लती, या किसी ने पैसे लिए, या कुछ लिखना भूल गई।"

"वेलकम टू अकाउंटिंग, दीदी।"

तीन फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स

यहाँ अकाउंटिंग सच में ताक़तवर बनती है। इतनी रिकॉर्डिंग और व्यवस्थितिंग से तीन डॉक्यूमेंट्स बनते हैं जो बिज़नेस की हेल्थ के बारे में सब बताते हैं। सोचो — बिज़नेस की तीन अलग मेडिकल रिपोर्ट्स।

1. मुनाफ़ा एंड घाटा स्टेटमेंट (P&L) — "कमा रहे हैं या गँवा रहे हैं?"

P&L (आमदनी स्टेटमेंट भी बोलते हैं) सबसे बुनियादी सवाल का जवाब देता है: किसी पर्टिकुलर पीरियड में मुनाफ़ा हुआ या घाटा?

स्ट्रक्चर बहुत सिंपल है:

राजस्व (सब कुछ जो कमाया)
- लागत ऑफ़ गुड्स सोल्ड (जो बेचा उसकी सीधा लागत)
= ग्रॉस मुनाफ़ा

ग्रॉस मुनाफ़ा
- ऑपरेटिंग ख़र्चे (रेंट, तनख़्वाह, बिजली, वग़ैरह)
= ऑपरेटिंग मुनाफ़ा (या घाटा)

ऑपरेटिंग मुनाफ़ा
- इंटरेस्ट, टैक्सेज़, बाक़ी ख़र्चे
= नेट मुनाफ़ा (या नेट घाटा)

पुष्पा दीदी का जनवरी का P&L (सिम्प्लीफ़ाइड):

पुष्पा दीदी का चाय-मैगी स्टॉल
मुनाफ़ा एंड घाटा स्टेटमेंट — जनवरी

राजस्व
  चाय सेल्स                    ₹51,000
  मैगी सेल्स                   ₹39,600
  बाक़ी आइटम्स (ऑमलेट वग़ैरह)     ₹16,200
  ─────────────────────────────────────
  कुल राजस्व                          ₹1,06,800

लागत ऑफ़ गुड्स सोल्ड
  दूध, चीनी, पत्ती             ₹16,500
  मैगी पैकेट्स                 ₹14,400
  अंडे, ब्रेड, बाक़ी सप्लाइज़    ₹8,100
  गैस                         ₹5,700
  ─────────────────────────────────────
  कुल COGS                             ₹44,700
                                         ─────────
  ग्रॉस मुनाफ़ा                           ₹62,100

ऑपरेटिंग ख़र्चे
  रेंट                         ₹6,000
  मददर तनख़्वाह                ₹5,000
  बिजली                        ₹800
  सफ़ाई/बनाए रखेंस             ₹500
  फुटकर ख़र्चे                  ₹1,200
  ─────────────────────────────────────
  कुल ऑपरेटिंग ख़र्चे               ₹13,500
                                         ─────────
  नेट मुनाफ़ा                             ₹48,600

अब पुष्पा दीदी को पता है: जनवरी में ₹48,600 मुनाफ़ा हुआ। "कोई 15-20 हज़ार" नहीं — एग्ज़ैक्टली ₹48,600 (टैक्स से पहले)। इस नंबर पर प्लान कर सकती हैं।

नोट: ये सिम्प्लीफ़ाइड नंबर्स हैं। असली P&L में टैक्सेज़, डेप्रिसिएशन, और दूसरी चीज़ें भी होती हैं जो नीचे डिस्कस करेंगे।

2. बैलेंस शीट — "क्या है मेरे पास और क्या देना है?"

P&L एक पीरियड के बारे में बताता है (ये महीना, ये क्वार्टर, ये साल)। बैलेंस शीट एक मोमेंट के बारे में बताता है — अभी, इसी वक़्त, बिज़नेस की फ़ाइनेंशियल पोज़ीशन क्या है। स्नैपशॉट।

तीन सेक्शन्स हैं:

एसेट्स — सब कुछ जो बिज़नेस के पास है या जो बाक़ी है।

  • ड्रॉअर और बैंक में कैश
  • भंडार (चाय, चीनी, मैगी का स्टॉक)
  • इक्विपमेंट (स्टोव, टेबल्स, चेयर्स, बर्तन)
  • ग्राहकों ने जो पैसे देने हैं (अकाउंट्स रिसीवेबल)

लायबिलिटीज़ — सब कुछ जो बिज़नेस को दूसरों को देना है।

  • बैंक का लोन
  • आपूर्तिकर्ता को देने हैं
  • रेंट या तनख़्वाह बाक़ी है

ओनर्स इक्विटी — एसेट्स में से लायबिलिटीज़ निकालो तो जो बचे। ये बिज़नेस में आपकी असली "नेट वर्थ" है।

बुनियादी इक्वेशन:

एसेट्स = लायबिलिटीज़ + ओनर्स इक्विटी

ये इक्वेशन हमेशा बैलेंस करती है। हमेशा। नहीं कर रही तो कुछ ग़लत है।

पुष्पा दीदी का सिम्प्लीफ़ाइड बैलेंस शीट:

पुष्पा दीदी का चाय-मैगी स्टॉल
बैलेंस शीट — 31 जनवरी

एसेट्स
  हाथ में कैश               ₹12,000
  बैंक में कैश               ₹1,45,000
  भंडार (सप्लाइज़)        ₹3,500
  इक्विपमेंट (स्टोव, टेबल्स)   ₹35,000
  ───────────────────────────────────
  कुल एसेट्स                         ₹1,95,500

लायबिलिटीज़
  आपूर्तिकर्ता पेयेबल (दूध)      ₹4,500
  ───────────────────────────────────
  कुल लायबिलिटीज़                    ₹4,500

ओनर्स इक्विटी
  पुष्पा दीदी का कैपिटल      ₹1,91,000
  ───────────────────────────────────
  कुल इक्विटी                         ₹1,91,000

  कुल लायबिलिटीज़ + इक्विटी           ₹1,95,500 ✓

बैलेंस शीट बताता है: बिज़नेस के पास ₹1,95,500 का सामान है, दूध वाले को ₹4,500 देने हैं, और पुष्पा दीदी की ओनरशिप ₹1,91,000 की है।

3. कैश फ़्लो स्टेटमेंट — "पैसा गया कहाँ?"

ये वो स्टेटमेंट है जो लोगों को कन्फ़्इस्तेमाल करता है। "P&L से मुनाफ़ा तो पता चल गया — पैसे का और क्या जानना है?"

क्योंकि मुनाफ़ा और कैश एक चीज़ नहीं है।

काग़ज़ पर फ़ायदेमंद हो सकते हैं और फिर भी कैश ख़त्म हो सकता है। कैसे? कई तरीक़ों से:

  • ₹50,000 का माल क्रेडिट पर बेचा। P&L में ₹50,000 राजस्व दिखता है। लेकिन कैश? अभी आया ही नहीं।
  • ₹2,00,000 का इक्विपमेंट ख़रीदा। कैश ₹2,00,000 कम हुआ। लेकिन P&L में ₹2,00,000 ख़र्चा नहीं दिखता — डेप्रिसिएशन के ज़रिए सालों में फैलता है।
  • ₹5,00,000 का लोन लिया। कैश बढ़ा, लेकिन ये राजस्व नहीं — लायबिलिटी है।

कैश फ़्लो स्टेटमेंट असली कैश की मूवमेंट ट्रैक करता है — कहाँ से आया, कहाँ गया।

तीन सेक्शन्स:

ऑपरेटिंग एक्टिविटीज़ — रोज़मर्रा के बिज़नेस से कैश। (सेल्स की कमाई, सप्लाइज़ का भुगतान, रेंट, तनख़्वाह।)

निवेश एक्टिविटीज़ — बड़ी चीज़ों की ख़रीद-बिक्री से कैश। (नया स्टोव ख़रीदा, पुराना फ़र्नीचर बेचा।)

फ़ाइनेंसिंग एक्टिविटीज़ — लोन्स, रीपेमेंट्स, या ओनर निवेश से कैश। (बैंक लोन लिया, EMI भरी, अपनी जेब से बिज़नेस में पैसा डाला।)

रावत जी को कैश फ़्लो की अहमियत मुश्किल तरीक़े से पता चली। शानदार एप्पल हार्वेस्ट हुआ — तीन बड़े बायर्स को ₹8 लाख के सेब बेचे। काग़ज़ पर अक्टूबर ज़बरदस्त दिख रहा था। लेकिन दो बायर्स ने अभी पे नहीं किया था। इधर कोल्ड स्टोरेज का रेंट ₹1.5 लाख, लेबर ₹80,000, ट्रांसपोर्ट ₹60,000 देना था। "फ़ायदेमंद" थे — लेकिन बिल्स पे करने का कैश नहीं था।

"P&L में तो बहुत पैसा दिखता था," उन्होंने भंडारी अंकल को बताया। "पर जेब में नहीं था।"

यही मुनाफ़ा और कैश फ़्लो का फ़र्क़ है। और इसने कॉम्पिटिशन से ज़्यादा स्मॉल बिज़नेसेज़ बंद करवाए हैं।

तीनों स्टेटमेंट्स याद रखने का आसान तरीक़ा:

स्टेटमेंटकौन सा सवालटाइम फ़्रेम
P&Lकमा रहे हैं या गँवा रहे हैं?पीरियड (महीना/क्वार्टर/साल)
बैलेंस शीटक्या है, क्या देना है, नेट वर्थ क्या?एक मोमेंट (स्नैपशॉट)
कैश फ़्लोकैश कहाँ से आया, कहाँ गया?पीरियड (महीना/क्वार्टर/साल)

एक्रूअल बनाम कैश बेसिस — पैसा कब काउंट करें?

ये एक सरप्राइज़िंगली ज़रूरी फ़र्क़ है जो फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स को असर डालता है।

कैश बेसिस अकाउंटिंग: ट्रांज़ैक्शन तब दर्ज करो जब कैश असलीी हाथ बदले।

  • ग्राहक को मैगी बेची, ₹100 कैश मिला। ₹100 राजस्व अभी दर्ज करो।
  • गैस सिलिंडर आ गया लेकिन पेमेंट अगले हफ़्ते देनी है। ख़र्चा अगले हफ़्ते दर्ज करो, जब असलीी पे करो।

एक्रूअल बेसिस अकाउंटिंग: ट्रांज़ैक्शन तब दर्ज करो जब वो हो, चाहे कैश कभी भी मूव हो।

  • ग्राहक को क्रेडिट पर मैगी बेची। अगले हफ़्ते पे करेगा। ₹100 राजस्व अभी दर्ज करो — क्योंकि सेल अभी हुई।
  • गैस सिलिंडर आज आया, पेमेंट अगले हफ़्ते। ख़र्चा आज दर्ज करो — क्योंकि गैस आज मिला।

बहुत छोटे बिज़नेसेज़ कैश बेसिस इस्तेमाल करते हैं क्योंकि सिंपल है। बस मनी इन और मनी आउट ट्रैक करो।

लेकिन बिज़नेस बढ़े — ख़ासकर अगर क्रेडिट देते हो या लेते हो — तो एक्रूअल बेसिस ज़्यादा एक्युरेट पिक्चर देता है।

भंडारी अंकल का काम ज़्यादातर क्रेडिट पर चलता है। कॉन्ट्रैक्टर आता है, ₹45,000 का सीमेंट, पाइप्स, फ़िटिंग्स लेता है, बोलता है — "भंडारी जी, महीने के एंड में दे दूँगा।" कैश बेसिस पर, भंडारी अंकल ₹0 राजस्व दिखाएँगे जब तक पैसा न आ जाए। एक्रूअल बेसिस पर, ₹45,000 राजस्व अभी रिकॉर्ड होगा, और साथ में ₹45,000 "अकाउंट्स रिसीवेबल" भी — यानी उनको मिलने वाला पैसा।

एक्रूअल मेथड असली इकोनॉमिक एक्टिविटी दिखाता है। कैश मेथड असली कैश पोज़ीशन दिखाता है। दोनों उपयोगी हैं। एक सर्टेन साइज़ (₹1 करोड़ राजस्व, या कंपनी हैं) से ऊपर के बिज़नेसेज़ को लीगली एक्रूअल बेसिस इस्तेमाल करना होता है।

व्यावहारिक सलाह: अगर अभी शुरू कर रहे हो, कैश बेसिस ठीक है। सिंपल रखो। लेकिन जानो कि एक्रूअल एग्ज़िस्ट करता है, क्योंकि बढ़ोगे तो स्विच करना पड़ेगा — और टैली या ज़ोहो बुक्स इस्तेमाल करते हो तो वो डिफ़ॉल्ट में एक्रूअल बेसिस ही इस्तेमाल करते हैं।

डेप्रिसिएशन और एमॉर्टाइज़ेशन — चीज़ों की वैल्यू गिरती है

नीमा और ज्योति ने 2019 में मुनस्यारी का होमस्टे फ़र्निश किया। बेड्स, मैट्रेसेज़, चेयर्स, टेबल्स, कर्टन्स, किचन इक्विपमेंट — कुल ₹3,50,000 का फ़र्नीचर और फ़िटिंग्स ख़रीदा।

तीन साल बाद, मैट्रेसेज़ बैठ गए, कुछ चेयर्स हिलने लगीं, कर्टन्स उड़ गए, किचन का मिक्सर ने जवाब दे दिया। ₹3,50,000 का सामान अब शायद ₹1,50,000 का है।

"ये तो होता है," ज्योति बोलती है। "चीज़ें पुरानी पड़ती हैं।"

वो सही कह रही है। और अकाउंटिंग में इसका नाम है: डेप्रिसिएशन।

डेप्रिसिएशन मतलब फ़िज़िकल एसेट की वैल्यू टाइम के साथ कम होना — इस्तेमाल, पुरानापन, या आउटडेटेड होने से।

बुक्स के लिए ये क्यों मायने रखता है? क्योंकि अगर नीमा और ज्योति ने 2019 में ₹3,50,000 का फ़र्नीचर ख़रीदा, तो पूरे ₹3,50,000 को 2019 का ख़र्चा दिखाना ग़लत होगा। फ़र्नीचर एक साल में "ख़त्म" नहीं हुआ — कई सालों तक बिज़नेस की सेवा किया। तो लागत उन सालों में बँटनी चाहिए।

आम मेथड — स्ट्रेट लाइन डेप्रिसिएशन:

फ़र्नीचर ₹3,50,000 का, 7 साल चलेगा (अंत में वैल्यू ज़ीरो), तो हर साल डेप्रिसिएशन:

₹3,50,000 ÷ 7 साल = ₹50,000 पर ईयर

हर साल नीमा और ज्योति ₹50,000 डेप्रिसिएशन ख़र्चा दर्ज करती हैं, और बैलेंस शीट पर फ़र्नीचर की वैल्यू ₹50,000 कम होती जाती है।

सालडेप्रिसिएशन ख़र्चाबैलेंस शीट पर वैल्यू
2019₹50,000₹3,00,000
2020₹50,000₹2,50,000
2021₹50,000₹2,00,000
2022₹50,000₹1,50,000
2023₹50,000₹1,00,000
2024₹50,000₹50,000
2025₹50,000₹0

व्यावहारिकी ये क्यों मायने रखता है?

  1. P&L ज़्यादा एक्युरेट बनता है। डेप्रिसिएशन के बिना, जिस साल बड़ी ख़रीदारी नहीं की उस साल मुनाफ़े बहुत ज़्यादा दिखेंगे, और जिस साल की उस साल बहुत कम।

  2. बैलेंस शीट यथार्थवादी रहता है। तीन साल बाद फ़र्नीचर ₹1,50,000 का है, ₹3,50,000 का नहीं। बैलेंस शीट को रिऐलिटी दिखानी चाहिए।

  3. टैक्स फ़ायदा। डेप्रिसिएशन ख़र्चा है, और ख़र्चे टैक्सेबल आमदनी कम करती हैं। गवर्नमेंट डेप्रिसिएशन क्लेम करने देती है ताकि टैक्स बिल कम हो। (ज़्यादा टैक्सेशन चैप्टर में।)

एमॉर्टाइज़ेशन क्या है?

एमॉर्टाइज़ेशन वही कॉन्सेप्ट है, लेकिन इनटैंजिबल एसेट्स के लिए — जो छू नहीं सकते। सॉफ़्टवेयर लाइसेंसेज़, पेटेंट्स, ब्रांड ट्रेडमार्क्स, वेबसाइट डेवलपमेंट लागतें।

प्रिया ने अपने एग्री-टेक ऐप का पहला वर्ज़न बनाने में ₹4,00,000 ख़र्च किए। ये एक साल का ख़र्चा नहीं — ऐप सालों तक बिज़नेस सर्व करेगा। तो वो इसे 4 सालों में एमॉर्टाइज़ करती है: ₹1,00,000 पर ईयर।

डेप्रिसिएशन = फ़िज़िकल चीज़ों की वैल्यू गिरना (फ़र्नीचर, वीइकल्स, इक्विपमेंट)। एमॉर्टाइज़ेशन = नॉन-फ़िज़िकल चीज़ों की वैल्यू गिरना (सॉफ़्टवेयर, लाइसेंसेज़, पेटेंट्स)।

दोनों का अकाउंटिंग ट्रीटमेंट लगभग एक जैसा है।

अकाउंट्स रिसीवेबल और अकाउंट्स पेयेबल — उधार का खेल

आइडियल दुनिया में हर ट्रांज़ैक्शन इंस्टैंट होता: बेचा, पैसा मिला, ख़त्म। लेकिन असली दुनिया में — ख़ासकर इंडिया में — क्रेडिट बिज़नेस की जान है।

अकाउंट्स रिसीवेबल (AR) — लोगों ने आपको देने हैं

भंडारी अंकल की दुकान क्रेडिट पर चलती है। उनकी लगभग 60% सेल्स उन कॉन्ट्रैक्टर्स को होती हैं जो सामान ले जाते हैं और बाद में पे करते हैं — कभी हफ़्ते के अंत में, कभी महीने के अंत में, कभी... बहुत बाद में।

किसी भी दिन कॉन्ट्रैक्टर्स उन्हें ₹3-5 लाख देने होते हैं। ये नंबर उनका अकाउंट्स रिसीवेबल है।

वो एक बही रखते हैं — हर कॉन्ट्रैक्टर का नाम और रनिंग बैलेंस। रमेश ₹78,000 देने है। तिवारी बिल्डर ₹1,12,000। नया कॉन्ट्रैक्टर सोनू ₹45,000।

"क्रेडिट देना ज़रूरी है — नहीं दोगे तो वो दूसरी दुकान चला जाएगा," भंडारी अंकल बताते हैं। "लेकिन क्रेडिट कंट्रोल भी ज़रूरी है — नहीं तो अपना पैसा डूब जाएगा।"

AR क्यों मायने रखता है:

  • ये पैसा लीगली आपका है, लेकिन बैंक में अभी नहीं आया
  • ज़्यादा AR मतलब कैश फ़्लो टाइट, भले P&L अच्छा दिखे
  • पुराना AR (90+ दिन) वॉर्निंग साइन है — जितना पुराना उधार, उतना कम मिलने का चांस
  • राजस्व की तुलना में बहुत ज़्यादा AR मतलब आप ग्राहकों को फ़्री लोन दे रहे हैं

भंडारी अंकल के AR नियम (22 साल में बने):

  1. नया ग्राहक: पहले 3 ऑर्डर्स कैश ओनली। क्रेडिट नहीं।
  2. नियमित ग्राहक: हिस्ट्री देखकर क्रेडिट लिमिट। रमेश को ₹1 लाख तक। नया कॉन्ट्रैक्टर सोनू ₹50,000 मैक्स।
  3. कोई बिल 60 दिन से ज़्यादा पुराना? पुराना साफ़ होने तक नया क्रेडिट नहीं।
  4. हर रविवार सारे बाक़ी बैलेंसेज़ समीक्षा करो।

अकाउंट्स पेयेबल (AP) — आपने दूसरों को देने हैं

दूसरा साइड। अकाउंट्स पेयेबल वो पैसा है जो बिज़नेस को आपूर्तिकर्ता, मकान मालिक, लेंडर्स, या किसी को देना है।

पुष्पा दीदी दूध शर्मा डेयरी से लेती हैं। रोज़ पे नहीं करतीं — हर शनिवार हिसाब करती हैं। तो शुक्रवार तक शर्मा जी को हफ़्ते के दूध के ₹1,800-2,000 देने होते हैं। ये उनका अकाउंट्स पेयेबल है।

भंडारी अंकल के लिए AP बड़ा है। सीमेंट डिस्ट्रीब्यूटर को किसी भी वक़्त ₹2 लाख देने हैं, 30 दिन का पेमेंट विंडो। पाइप आपूर्तिकर्ता को ₹80,000। इलेक्ट्रिकल फ़िटिंग्स वाले को ₹45,000।

AR और AP का रिश्ता बहुत ज़रूरी है:

अगर ग्राहकों 60 दिन में पे कर रहे हैं, लेकिन आपूर्तिकर्ता 30 दिन में पेमेंट चाहते हैं — तो 30 दिन का गैप है जहाँ कैश कहीं और से लाना पड़ेगा। इसे कैश कन्वर्ज़न साइकल बोलते हैं, और इसे सँभालना बिज़नेस ओनर का सबसे ज़रूरी काम है।

भंडारी अंकल ने ये अनुभव से सीखा: "मैं डिस्ट्रीब्यूटर को 30 दिन में पे करता हूँ। अगर कॉन्ट्रैक्टर मुझे 45 दिन में पे करे, तो 15 दिन का गैप है। वो 15 दिन मुझे अपनी जेब से लगाना पड़ता है।"

उन्होंने इसे हल किया — डिस्ट्रीब्यूटर से बेहतर टर्म्स नेगोशिएट कीं (30 की जगह 40 दिन) और कॉन्ट्रैक्टर्स से स्ट्रिक्टली कलेक्ट करने लगे (45 की जगह 30 दिन)। अब गैप लगभग ज़ीरो है।

फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स पढ़ना — क्या देखें

CA बनने की ज़रूरत नहीं फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स पढ़ने के लिए। बस सही सवाल पूछने आने चाहिए।

P&L पढ़ना

ग्रॉस लाभ मार्जिन = ग्रॉस मुनाफ़ा ÷ राजस्व

पुष्पा दीदी: ₹62,100 ÷ ₹1,06,800 = 58%

मतलब हर ₹100 राजस्व में से ₹58 रॉ मटीरियल्स देने के बाद बचते हैं। अगर ये नंबर टाइम के साथ गिर रहा है, तो या तो लागतें बढ़ रही हैं या दाम नहीं बढ़ा रहे।

नेट लाभ मार्जिन = नेट मुनाफ़ा ÷ राजस्व

पुष्पा दीदी: ₹48,600 ÷ ₹1,06,800 = 45.5%

ये असली बॉटम-लाइन लाभप्रदता है। चाय स्टॉल के लिए ये एक्सीलेंट है। हार्डवेयर ट्रेडिंग बिज़नेस के लिए 5-8% नेट मार्जिन सामान्य है। अलग-अलग उद्योगों में "सामान्य" मार्जिन बहुत अलग होता है।

क्या देखें:

  • राजस्व मंथ-ऑन-मंथ बढ़ रहा है? फ़्लैट है? गिर रहा है?
  • लागतें राजस्व से तेज़ बढ़ रही हैं? (ख़राब साइन।)
  • ग्रॉस मार्जिन स्टेडी है? ग्रॉस मार्जिन सिकुड़ रहा है मतलब मूल्य निर्धारण पावर कम हो रही है।
  • कोई अन्इस्तेमालुअली बड़ा ख़र्चा? वन-टाइम लागत है या रिकरिंग समस्या?

बैलेंस शीट पढ़ना

करंट रेशियो = करंट एसेट्स ÷ करंट लायबिलिटीज़

ये बताता है: शॉर्ट-टर्म देनदारियाँ पे कर सकते हो? 1 से ऊपर हो तो ठीक है। 1 से नीचे मतलब बिल्स पे करने में दिक़्क़त हो सकती है।

डेट-टू-इक्विटी रेशियो = कुल लायबिलिटीज़ ÷ ओनर्स इक्विटी

बिज़नेस कितना उधार से चल रहा है बनाम अपने पैसे से? ज़्यादा रेशियो मतलब ज़्यादा जोखिम — बहुत ज़्यादा देनदारी है ओनरशिप की तुलना में।

क्या देखें:

  • कैश पोज़ीशन हेल्दी है या ख़तरनाक लेवल पर?
  • अकाउंट्स रिसीवेबल बहुत तेज़ बढ़ रहा है? (क्रेडिट सेल्स बढ़ रही हैं जो शायद पूरी कलेक्ट न हों।)
  • इक्विपमेंट पुराना हो रहा है? (डेप्रिसिएशन के बाद लो एसेट वैल्यू — जल्दी बड़ा रिप्लेसमेंट ख़र्चा आ सकता है।)

कैश फ़्लो स्टेटमेंट पढ़ना

ऑपरेशंस से कैश फ़्लो पॉज़िटिव है?

अगर कोर बिज़नेस ऑपरेशंस से कैश जेनरेट नहीं हो रहा, तो बुनियादी समस्या है। काग़ज़ पर बढ़ रहे हो लेकिन कैश बह रहा है।

निवेश ठीक से हो रहा है?

कुछ कैश आउटफ़्लो निवेश के लिए (नया इक्विपमेंट, रिनोवेशन) हेल्दी है — मतलब रीनिवेश कर रहे हो। लेकिन बहुत ज़्यादा मतलब ओवर-एक्सटेंड हो रहे हो।

फ़ाइनेंसिंग में क्या हो रहा है?

हर महीने नया लोन ले रहे हो बस टिकने के लिए? रेड फ़्लैग। स्टेडिली लोन्स पे ऑफ़ कर रहे हो? हेल्दी।

विक्रम ने ये स्टेटमेंट्स पढ़ना तब सीखा जब फ़्रेंचाइज़ी आउटलेट खोला। फ़्रेंचाइज़र मंथली P&L टेम्प्लेट्स शेयर करता था और भरवाता था। पहले होमवर्क लगता था। छह महीने बाद समझ आया — ये सबसे काम का होमवर्क था।

"P&L बताता है कि महीने में कमाया कितना। बैलेंस शीट बताता है कि बिज़नेस कितना स्ट्रॉन्ग है। कैश फ़्लो बताता है कि पैसा कहाँ गया। तीन अलग तस्वीरें, एक ही कहानी।"

बुककीपिंग की आम ग़लतियाँ

अर्जुन कुछ घंटे से पुष्पा दीदी की मदद कर रहा है। उसने कई चीज़ें गौर की हैं जो वो — और ज़्यादातर स्मॉल बिज़नेस ओनर्स — ग़लत करते हैं।

1. पर्सनल और बिज़नेस का पैसा मिलाना।

नंबर वन ग़लती। पुष्पा दीदी कैश ड्रॉअर से ₹500 निकालती हैं घर का सामान लाने। रिकॉर्ड नहीं करतीं। अब बिज़नेस अकाउंट्स ₹500 ज़्यादा दिखा रहे हैं जो असलीी है नहीं। महीने भर में ऐसी छोटी-छोटी निकासियाँ जुड़ जाती हैं और बुक्स कभी मैच नहीं करतीं।

फ़िक्स: बिज़नेस के लिए अलग बैंक अकाउंट खोलो। हर पर्सनल विथड्रॉअल "ओनर्स ड्रॉइंग" दर्ज करो। बिज़नेस का पैसा और घर का पैसा — स्ट्रिक्टली अलग रखो।

2. छोटे ख़र्चे रिकॉर्ड नहीं करना।

आपूर्तिकर्ता आया तो ₹50 की चाय पिलाई। ₹200 का ऑटो सप्लाइज़ लेने गए। ₹150 का फ़ोन रिचार्ज जो आधा पर्सनल, आधा बिज़नेस। ये सब बहुत छोटे लगते हैं। लेकिन ₹50 रोज़ = ₹1,500 महीना = ₹18,000 साल। ये असली पैसा है जो बुक्स से ग़ायब हो रहा है।

फ़िक्स: सब कुछ दर्ज करो। सब कुछ। अगर पैसा लगा और बिज़नेस के लिए था — लिखो।

3. रिसीट्स नहीं रखना।

₹3,200 इलेक्ट्रिकल रिपेयर में दिए। रिसीट नहीं ली। तीन महीने बाद ख़र्चे का कोई प्रूफ़ नहीं। टैक्स डिडक्शंस और ट्रैकिंग के लिए ये मायने रखता है।

फ़िक्स: रिसीट्स रखो। एक सिंपल फ़ोल्डर — फ़िज़िकल हो या डिजिटल (फ़ोटो खींच लो) — महीने-वाइज़ व्यवस्थित करो।

4. राजस्व को मुनाफ़ा समझना।

"आज ₹5,000 का बिज़नेस किया!" नहीं — ₹5,000 राजस्व हुआ। अगर लागत ₹3,500 थी, तो ₹1,500 कमाए। राजस्व और मुनाफ़ा कन्फ़्इस्तेमाल करना बहुत ऑप्टिमिस्टिक फ़ैसले तक ले जाता है।

5. अकाउंट्स रिसीवेबल की एज इग्नोर करना।

जो पैसा 90 दिन से ज़्यादा पुराना बाक़ी है, उसके कलेक्ट होने का चांस शायद 50% है। 180 दिन से ज़्यादा? शायद 20%। अगर ट्रैक नहीं कर रहे कि रिसीवेबल्स कितने पुराने हैं, तो पोटेंशियल बैड डेट पर बैठे हैं और पता नहीं।

6. मंथली रिकन्सिलिएशन नहीं करना।

महीने में कम से कम एक बार — बुक्स को बैंक स्टेटमेंट और ड्रॉअर के कैश से मैच करो। मैच नहीं कर रहा तो पता लगाओ क्यों। डिस्क्रेपेंसीज़ पाइल अप होने दो — कुछ महीनों बाद ट्रेस करना नामुमकिन हो जाता है।

"दीदी, जानती हो सबसे बड़ी ग़लती क्या है?" अर्जुन पूछता है।

"बुक्स ही न रखना?"

"नहीं। सबसे बड़ी ग़लती है बुक्स रखना लेकिन कभी पढ़ना नहीं। कुछ लोग बड़े रिलीजियसली सब लिखते हैं — लेकिन महीने के अंत में बैठकर नंबर्स क्या बोल रहे हैं, ये कभी नहीं देखते। ये वैसा है जैसे डायरी ऐसी भाषा में लिखी जो ख़ुद नहीं समझते।"

टूल्स — हाथ से करने की ज़रूरत नहीं

अच्छी ख़बर: 2025 है, रजिस्टर में हाथ से डबल एंट्री करने की ज़रूरत नहीं। ऐसे टूल्स हैं जो बुककीपिंग बहुत आसान बना देते हैं।

खाताबुक / OkCredit (फ़्री, मोबाइल-फ़र्स्ट)

किसके लिए: बहुत छोटे बिज़नेसेज़, दुकानदार, ठेले वाले।

ये ऐप्स असल में पुष्पा दीदी की नोटबुक का डिजिटल वर्ज़न हैं। पैसा आया, पैसा गया, किसने कितना देना है — दर्ज करो। ग्राहक को SMS या व्हाट्सऐप पर अपने-आप पेमेंट रिमाइंडर भेजते हैं। सिंपल, फ़्री, और हिंदी में।

क्या करते हैं:

  • डेली सेल्स और ख़र्चे ट्रैक
  • ग्राहक-वाइज़ क्रेडिट रिकॉर्ड (डिजिटल बही खाता)
  • पेमेंट रिमाइंडर्स
  • बुनियादी रिपोर्ट्स

क्या नहीं करते:

  • फ़ुल डबल-एंट्री अकाउंटिंग
  • सही फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स
  • GST कम्प्लायंस
  • भंडार प्रबंधन

वर्डिक्ट: बढ़िया स्टार्टिंग पॉइंट। अगर पुष्पा दीदी हैं और बस नोटबुक डिजिटल करनी है — यहाँ से शुरू करो।

टैली (टैलीप्राइम)

किसके लिए: छोटे से मीडियम बिज़नेसेज़ जिन्हें सही अकाउंटिंग चाहिए।

टैली इंडिया का सबसे पॉपुलर अकाउंटिंग सॉफ़्टवेयर है। आपके CA ज़रूर इस्तेमाल करते हैं। फ़ुल डबल-एंट्री अकाउंटिंग, GST कम्प्लायंस, भंडार प्रबंधन, तीनों फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स — सब करता है।

क्या करता है:

  • कम्प्लीट डबल-एंट्री बुककीपिंग
  • GST-कम्प्लायंट इनवॉइसिंग और रिटर्न फ़ाइलिंग
  • भंडार प्रबंधन
  • पेरोल
  • सारे फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स (P&L, बैलेंस शीट, कैश फ़्लो)
  • बैंक रिकन्सिलिएशन

लागत: लगभग ₹18,000 सिंगल-इस्तेमालर लाइसेंस (वन-टाइम) या ₹7,200/ईयर रेंटल मॉडल।

वर्डिक्ट: अगर भंडारी अंकल हैं — क्रेडिट ग्राहकों, भंडार, GST ऑब्लिगेशंस — तो टैली गोल्ड स्टैंडर्ड है। लर्निंग कर्व मॉडरेट है — बहुत से CAs बुनियादी टैली प्रशिक्षण देते हैं।

ज़ोहो बुक्स

किसके लिए: बढ़ते बिज़नेसेज़, D2C ब्रांड्स, सेवा बिज़नेसेज़, ऑनलाइन सेल्स वाले।

ज़ोहो बुक्स क्लाउड-बेस्ड है — ब्राउज़र और फ़ोन पर चलता है। मॉडर्न, वेल-डिज़ाइंड, पेमेंट गेटवेज़, बैंक अकाउंट्स, और ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स से इंटीग्रेट होता है।

क्या करता है:

  • जो टैली करता है, प्लस:
  • क्लाउड-बेस्ड (कहीं से भी एक्सेस)
  • अपने-आप बैंक फ़ीड इंटीग्रेशन
  • इनवॉइसेज़ के लिए क्लाइंट पोर्टल
  • टाइम ट्रैकिंग (सेवा बिज़नेसेज़ के लिए)
  • मल्टी-करेंसी सपोर्ट
  • API इंटीग्रेशंस

लागत: ₹25 लाख से कम राजस्व वालों के लिए फ़्री प्लान। पेड प्लान्स ₹749/मंथ से।

वर्डिक्ट: अगर अंकिता हैं — ऑनलाइन पहाड़ी फ़ूड बेच रही हैं, या प्रिया टेक बिज़नेस बना रही है — तो ज़ोहो बुक्स एक्सीलेंट है। टैली से ज़्यादा मॉडर्न, ऑनलाइन ऑपरेशंस के लिए बेहतर।

कौन सा टूल इस्तेमाल करें?

आपकी सिचुएशनशुरू करो
ठेला, बहुत छोटी दुकान, बस पैसा ट्रैक करना हैखाताबुक
छोटी दुकान, क्रेडिट ग्राहकों, GST फ़ाइलिंगटैली
ऑनलाइन बिज़नेस, D2C ब्रांड, सेवा बिज़नेस, तेज़ बढ़तज़ोहो बुक्स
CA है जो सब करता हैCA से पूछो — शायद टैली इस्तेमाल करते हैं
कुछ समझ नहीं आ रहा, बस शुरू करना हैआज खाताबुक, बाद में टैली/ज़ोहो जब ज़रूरत हो

अंकिता ने शुरू में नोटबुक से काम चलाया जब इंस्टाग्राम पर पहाड़ी चटनी बेचनी शुरू की। फिर खाताबुक लगाई — कौन से ग्राहक ने पे किया, ट्रैक करने के लिए। जब मंथली राजस्व ₹1 लाख क्रॉस किया और GST रजिस्ट्रेशन करवाया, तो ज़ोहो बुक्स पर शिफ़्ट की। हर टूल उस चरण के लिए सही था।

"टूल ज़्यादा सोचो मत," वो बोलती है। "बस दर्ज करना शुरू करो। नोटबुक नथिंग से बेटर है। ऐप नोटबुक से बेटर है। सॉफ़्टवेयर ऐप से बेटर है। लेकिन ज़रूरी चीज़ ये है कि शुरू करो।"

सब मिलाकर

शाम हो गई है। नदी के पार पहाड़ों के पीछे सूरज डूब रहा है। अर्जुन ने पूरी दोपहर पुष्पा दीदी के साथ बिताई, उनके अकाउंट्स पर काम करते हुए। तीन महीने की नोटबुक एंट्रीज़ को सिंपल लेजर में व्यवस्थित किया। उनका पहला P&L स्टेटमेंट बनाया। और नंबर ने चौंकाया।

"जनवरी में ₹48,600? मुझे तो लगता था ₹15,000-20,000 होगा।"

"दीदी, आप नेट मुनाफ़ा और ड्रॉअर में बचे कैश को कन्फ़्इस्तेमाल कर रही थीं। रेंट बिज़नेस से जाता है। मददर की तनख़्वाह बिज़नेस से जाती है। गैस, दूध, चीनी — सब बिज़नेस ख़र्चे हैं जो राजस्व में से निकलती हैं आपकी जेब तक पहुँचने से पहले। सब निकलने के बाद जो बचता है — वो नेट मुनाफ़ा है। और वो ₹48,600 है।"

पुष्पा दीदी एक पल चुप रहती हैं। फिर मुस्कुराती हैं। "तो मैं अपनी सोच से अच्छा कर रही हूँ?"

"बहुत अच्छा। लेकिन बिना नंबर्स के कभी पता नहीं चलता।"

अर्जुन जाने से पहले उनके फ़ोन में खाताबुक इंस्टॉल करता है। "इससे शुरू करो। जो नोटबुक में लिखती हो वही — बस डिजिटली। अगले महीने आऊँगा, साथ में नंबर्स देखेंगे।"

वो ऐप देखती हैं, फिर अपनी पुरानी चाय के दाग़ वाली नोटबुक। "तुम्हें पता है, मैं सालों से ये स्टॉल चला रही हूँ। किसी ने कभी ये सब नहीं सिखाया।"

"क्योंकि स्मॉल बिज़नेस ओनर्स को कोई अकाउंटिंग नहीं सिखाता। CA स्टूडेंट्स को क्लासरूम में सिखाते हैं। लेकिन जिन्हें असलीी ज़रूरत है — जो बिज़नेस चला रहे हैं — वो ख़ुद ही फ़िगर आउट करें।"

"अब नहीं," पुष्पा दीदी बोलती हैं, उसके लिए आख़िरी कप चाय डालती हुईं।


इस चैप्टर की ज़रूरी बातें:

  1. अकाउंटिंग विकल्पल नहीं है। ये वो भाषा है जो बिज़नेस बोलता है। पढ़नी नहीं आती तो अंदाज़े लगा रहे हो।
  2. सिंगल एंट्री से शुरू करो (पैसा आया, पैसा गया) — कुछ न करने से बेहतर। बिज़नेस बढ़े तो डबल एंट्री पर आओ।
  3. डेबिट और क्रेडिट हर ट्रांज़ैक्शन के दो साइड्स हैं। कुल डेबिट्स हमेशा कुल क्रेडिट्स के बराबर।
  4. जर्नल → लेजर → ट्रायल बैलेंस — रॉ डेटा से व्यवस्थित्ड नॉलेज तक का रास्ता।
  5. तीन फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स तीन अलग कहानियाँ बताते हैं: P&L (मुनाफ़ा), बैलेंस शीट (फ़ाइनेंशियल पोज़ीशन), कैश फ़्लो (असली पैसे की मूवमेंट)।
  6. मुनाफ़ा और कैश एक चीज़ नहीं। कभी कन्फ़्इस्तेमाल मत करो।
  7. डेप्रिसिएशन बड़ी ख़रीदारी की लागत उसकी उपयोगी लाइफ़ में बाँटता है।
  8. रिसीवेबल्स और पेयेबल्स ट्रैक करो — यहीं कैश फ़्लो समस्याएँ छुपी रहती हैं।
  9. पर्सनल और बिज़नेस का पैसा मत मिलाओ। गंभीरली।
  10. टूल इस्तेमाल करो। नोटबुक → खाताबुक → टैली/ज़ोहो बुक्स। बस शुरू करो।

अगले चैप्टर में पुष्पा दीदी को कुछ अच्छा नहीं लगता: पता चलता है कि मैगी पर कम चार्ज कर रही हैं और दूध ज़्यादा मँगवा रही हैं। दाम कैसे सेट करें? कितना मार्जिन असल में चाहिए? वक़्त है फ़ाइनेंशियल लिटरेसी की बात करने का — वो नंबर्स समझना जो हर रोज़ के बिज़नेस फ़ैसले चलाते हैं।