रणनीति और निर्णय प्रक्रिया
रानीखेत की वो शाम
दिसंबर की शाम है, रानीखेत में। रावत जी अपनी बरामदे में बैठे हैं, सामने सेब का बगीचा दिख रहा है जो दो पीढ़ियों से परिवार का पेट पालता आया है। उनकी पत्नी ने चाय बनाई है। बेटा Dehradun से वीकेंड पर आया है। और रावत जी के सामने एक बड़ा फ़ैसला है।
जूस प्रक्रियािंग यूनिट। ₹12 लाख का निवेश। कोल्ड-प्रेस मशीन, एक छोटा प्रक्रियािंग रूम, FSSAI लाइसेंस, पैकेजिंग, ब्रांडिंग। बेटे ने रिसर्च किया है — ऐपल जूस, ऐपल साइडर विनेगर, ड्राइड ऐपल चिप्स। "वैल्यू-ऐडेड उत्पाद," बेटा बोलता है। मार्जिन रॉ सेबों से 3-4 गुना ज़्यादा है मंडी में।
पड़ोसी तिवारी जी ने सुना है कि स्टेट गवर्नमेंट फ़ूड प्रक्रियािंग यूनिट्स के लिए PM FME स्कीम के तहत सब्सिडी दे रही है। "लागू करो, 35% सब्सिडी मिल जाएगी," तिवारी जी आत्मविश्वासी हैं।
पत्नी कन्विंस्ड नहीं हैं। "बारह लाख बच्चों के फ़्यूचर की सेविंग्स हैं। अगर काम नहीं किया तो? जूस प्रक्रियािंग हमें नहीं आती। सेब आते हैं।"
बेटा बोलता है: "पापा, हर साल मंडी में सेब का दाम गिरता जा रहा है। अगर कुछ नहीं किया तो 5 साल में ये बगीचा ब्रेक-ईवन भी नहीं करेगा।"
तीन आवाज़ें। तीन नज़रिए। तीनों वजहेबल।
रावत जी क्या करें?
यही वो फ़ैसले हैं जो बिज़नेस ओनर्स की नींद उड़ा देते हैं। डेली वाले नहीं — क्या स्टॉक करें, कौनसा बिल पहले भरें, किसी ग्राहक को क्रेडिट दें या नहीं। वो संचालनल फ़ैसले हैं। ज़रूरी हैं, लेकिन वसूल हो सकते हैं।
बड़े फ़ैसले — कहाँ निवेश करें, किस पर बेट लगाएँ, कब डायरेक्शन बदलें — ये स्ट्रेटेजिक फ़ैसले हैं। सही निकले तो बिज़नेस बढ़ता है। गलत निकले तो दूसरा मौका शायद ना मिले।
ये चैप्टर इन्हीं बड़े फ़ैसले के बारे में है। MBA टेक्स्टबुक के पेचीदा फ़्रेमवर्क्स नहीं — बल्कि व्यावहारिक टूल्स जो रावत जी, पुष्पा दीदी, भंडारी अंकल, और उत्तराखंड का हर बिज़नेस ओनर इस्तेमाल कर सके।
1. रणनीति असल में है क्या?
रणनीति कोई 50-पेज का डॉक्यूमेंट नहीं है। PowerPoint प्रेज़ेंटेशन नहीं है। सिर्फ़ बड़ी कंपनीज़ के लिए नहीं है।
रणनीति दो सवालों का जवाब है:
- मैं कहाँ मुक़ाबला करूँगा? (कौनसा मार्केट, कौनसे ग्राहकों, कौनसी जगह, कौनसे उत्पाद)
- मैं कैसे जीतूँगा? (मुझमें क्या अलग है, मेरा फ़ायदा क्या है)
बस। बाक़ी सब ब्योरा है।
पुष्पा दीदी की रणनीति — भले उन्होंने ये वर्ड कभी नहीं बोला: मैं Triveni Ghat, Rishikesh में चाय मार्केट में मुक़ाबला करती हूँ, और मैं जीतती हूँ अपनी प्राइम जगह, लगातार गुणवत्ता, और नियमित ग्राहकों से रिश्ते की वजह से।
भंडारी अंकल की रणनीति: मैं Haldwani के हार्डवेयर रिटेल मार्केट में मुक़ाबला करता हूँ, और मैं जीतता हूँ 22 साल के ट्रस्ट, कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ क्रेडिट रिश्ते, और ग्राहकों की ज़रूरत पहचानने की वजह से।
अंकिता की रणनीति: मैं प्रीमियम D2C पहाड़ी फ़ूड मार्केट में मुक़ाबला करती हूँ, और मैं जीतती हूँ ऑथेंटिक ओरिजिन, सुंदर ब्रांडिंग, और सीधे Instagram-टू-ग्राहक पाइपलाइन की वजह से।
किसी ने ये लिखकर नहीं रखा। लेकिन सबको इंस्टिंक्टिवली पता है। जिस दिन आप साफ़ तौर पर बोल सकें कि कहाँ मुक़ाबला करते हैं और कैसे जीतते हैं — उस दिन आपके पास रणनीति है।
ख़तरा: जब आप इन दो सवालों का जवाब नहीं दे सकते — जब सबको सब कुछ देने की कोशिश कर रहे हैं, या जब पता ही नहीं कि अलग क्या है — तो बिना रणनीति के चल रहे हैं। बिना रणनीति का बिज़नेस ऐसा है जैसे पहाड़ में बिना रास्ते के चलना। कहीं पहुँचोगे, लेकिन शायद वहाँ नहीं जहाँ जाना था।
2. अपना मुक़ाबलािटिव फ़ायदा पहचानो
मुक़ाबलािटिव फ़ायदा एक सिंपल सवाल का फ़ैंसी नाम है: ग्राहक मेरे पास क्यों आए, किसी और के पास क्यों नहीं?
अगर इसका अच्छा जवाब नहीं है, तो ग्राहक दाम पर तय करता है। और दाम पर मुक़ाबला करना रेस टू द बॉटम है — कोई न कोई हमेशा और सस्ता बेचने को तैयार मिलेगा।
फ़ायदा कहाँ से आता है
हमारे कैरेक्टर्स को देखो:
पुष्पा दीदी — जगह उनका स्टॉल Triveni Ghat के पास है — Rishikesh का सबसे विज़िटेड स्पॉट। हज़ारों टूरिस्ट्स और श्रद्धालु रोज़ गुज़रते हैं। ये स्पॉट उन्होंने ऐक्सिडेंटली नहीं लिया — दो साल वेट किया इसके लिए। किसी गली में बेटर चाय बेचने वाला भी उनका फ़ुट ट्रैफ़िक मैच नहीं कर सकता।
अंकिता — स्टोरी और ऑथेंटिसिटी अंकिता का अचार और चटनी असली पहाड़ी रेसिपीज़ से बनता है, पहाड़ के गाँवों की विमेन सेल्फ़-मदद ग्रुप्स से सोर्स्ड। ग्राहकों सिर्फ़ अचार नहीं ख़रीद रहे — पहाड़ से कनेक्शन ख़रीद रहे हैं, एक स्टोरी ख़रीद रहे हैं, गिफ़्ट-वर्दी उत्पाद ख़रीद रहे हैं। कारख़ाना-मेड "पहाड़ी स्टाइल" अचार आधे दाम पर भी ये ऑथेंटिसिटी रेप्लिकेट नहीं कर सकता।
भंडारी अंकल — रिश्ते और ट्रस्ट बाईस साल के क्रेडिट रिश्ते। कॉन्ट्रैक्टर्स उन्हें डिस्ट्रीब्यूटर से पहले कॉल करते हैं। वो जानते हैं कि Haldwani के प्लंबर को टिपिकली कौनसी साइज़ पाइप चाहिए। ट्रस्टेड बिल्डर्स को 30 दिन का क्रेडिट देते हैं। नई दुकान चमकदार शेल्व्ज़ लगा ले — 22 साल का ट्रस्ट ओवरनाइट नहीं बनता।
नीमा और ज्योति — अनुभव उनका होमस्टे सिर्फ़ रूम नहीं — अनुभव है। पहाड़ी खाना, नेचर वॉक्स, लोकल कहानियाँ। उसी इलाक़ा में ₹800 वाले बजट होटल्स हैं। नीमा-ज्योति ₹2,500-4,000 चार्ज करती हैं। गेस्ट्स अनुभव के लिए आते हैं, सिर्फ़ बेड के लिए नहीं।
प्रिया — टेक्नोलॉजी उनका एग्री-टेक ऐप कुछ ऐसा करता है जो पहले मुमकिन नहीं था — किसानों को सीधे बायर्स से जोड़ता है, बीच के मिडलमैन हटाकर। टेक्नोलॉजी ही फ़ायदा है। मंडी का आढ़तिया ऐप रेप्लिकेट नहीं कर सकता।
दाम का जाल
अगर आप अलग नहीं हैं, तो दाम पर मुक़ाबला करोगे। और दाम मुक़ाबलािशन ब्रूटल है:
- कोई आपसे सस्ता बेचता है
- आप उससे सस्ता बेचते हो
- मार्जिन्स सिकुड़ते हैं
- गुणवत्ता गिरती है (क्योंकि लागत काटनी पड़ती है बचने के लिए)
- ग्राहकों को बुरी सेवा मिलती है
- सब हारते हैं
भंडारी अंकल ने ये होते देखा। 2 km दूर नई हार्डवेयर शॉप खुली। ओनर ने सीमेंट और TMT बार्स पर दामेज़ स्लैश किए ग्राहकों खींचने के लिए। कुछ नियमित चले भी गए। लेकिन 14 महीने में नई दुकान बंद हो गई — ज़ीरो मार्जिन पर कमोडिटी गुड्स बेचकर बचना नहीं कर सकते।
अपनी अलग पहचान ढूँढो। नहीं मिलती तो बनाओ। बेटर सेवा, बेटर गुणवत्ता, बेटर कन्वीनियंस, यूनीक उत्पाद, ट्रस्टेड नाम — कुछ तो।
3. ध्यान — सब कुछ नहीं कर सकते
स्मॉल बिज़नेसेज़ की सबसे आम स्ट्रेटेजिक ग़लती — बहुत ज़्यादा करने की कोशिश।
डाइवर्सिफ़ाई करने का टेम्प्टेशन
जब बिज़नेस अच्छा चल रहा हो तो नई चीज़ों में एक्सपैंड करने का मन करता है। जब बुरा चल रहा हो तो नई चीज़ ट्राई करने का मन करता है कि शायद कुछ चल जाए। दोनों ख़तरनाक हो सकते हैं।
नीमा और ज्योति का चॉइस: होमस्टे शुरू करते वक़्त उनके सामने दो सेगमेंट्स थे: बजट ट्रैवलर्स (बैकपैकर्स, स्टूडेंट्स, ₹500-800/नाइट) और प्रीमियम ट्रैवलर्स (पेशेवर्स, कपल्स, फ़ैमिलीज़, ₹2,000-5,000/नाइट)। दोनों सर्व कर सकती थीं — कुछ सस्ते रूम्स, कुछ महँगे।
उन्होंने सिर्फ़ प्रीमियम चुना। क्यों?
- प्रीमियम गेस्ट्स ज़्यादा खर्च करते हैं और ज़्यादा दिन रुकते हैं
- प्रीमियम गेस्ट्स बेटर समीक्षाज़ छोड़ते हैं (जो और प्रीमियम गेस्ट्स लाते हैं)
- बजट हॉस्टल चलाना वॉल्यूम गेम है — बहुत गेस्ट्स, टाइट मार्जिन्स, ज़्यादा बनाए रखेंस
- प्रीमियम होमस्टे गुणवत्ता गेम है — कम गेस्ट्स, हाई मार्जिन्स, पर्सनल अटेंशन
- पर्सनल अटेंशन तब मुमकिन नहीं जब 15 बजट बैकपैकर्स भी मैनेज करने हों
एक सेगमेंट चूज़ करके उसे अच्छे से कर सकीं। दोनों सर्व करतीं तो कोई भी अच्छे से नहीं होता।
अंकिता का ध्यान: अंकिता ने 5 उत्पाद से शुरू किया — मिक्स्ड पिकल, भट्ट की चटनी, पहाड़ी निंबू अचार, ड्राइड हर्ब्स, और हनी। वो 50 उत्पाद लॉन्च कर सकती थीं। हर बार गाँव जाती हैं तो नई रेसिपी मिलती है, नया इंग्रीडिएंट, नया पोटेंशियल उत्पाद।
लेकिन उन्होंने रोका। क्यों?
- हर नए उत्पाद के लिए टेस्टिंग, सोर्सिंग, FSSAI अप्रूवल, पैकेजिंग डिज़ाइन, फ़ोटोग्राफ़ी, लिस्टिंग चाहिए
- ज़्यादा उत्पाद = गुणवत्ता कंट्रोल मुश्किल
- इन्वेंटरी लागत बढ़ती है, कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ती है
- 5 उत्पाद एक्सेप्शनली अच्छे करो तो रेप्युटेशन बनती है; 50 एवरेज करो तो कुछ नहीं बनता
ध्यान का नियम: कम चीज़ें करो, बेहतर करो। एक्सपैंड बाद में कर लोगे — जब कोर सॉलिड हो जाए। कोर सॉलिड होने से पहले एक्सपैंड करना ऐसा है जैसे फ़ाउंडेशन सेट होने से पहले दूसरी मंज़िल बनाना।
4. मार्केट को पढ़ना
रणनीति सिर्फ़ इसके बारे में नहीं कि आप क्या अच्छा करते हैं — बल्कि इसके बारे में भी है कि आपके चारों तरफ़ क्या हो रहा है। मार्केट हमेशा बदलता रहता है, और जो बिज़नेसेज़ सही वक़्त पर बदलाव गौर कर लेते हैं, वो बचते हैं।
क्या बदला — और किसने देखा
उत्तराखंड में टूरिज़्म बूम: COVID के बाद डोमेस्टिक टूरिज़्म फट पड़ा। उत्तराखंड ने एक साल में 4 करोड़ से ज़्यादा टूरिस्ट्स देखे। होमचरण़, एडवेंचर टूरिज़्म, स्पिरिचुअल टूरिज़्म — सब सर्ज किया। नीमा और ज्योति ने बूम से पहले ही होमस्टे शुरू कर दिया था। जब बूम आया, वो रेडी थीं। बाक़ी लोगों ने हड़बड़ी में अपने घर होमस्टे में कन्वर्ट करना शुरू किया, लेकिन तब तक नीमा-ज्योति के पास समीक्षाज़, रेप्युटेशन, और रिपीट गेस्ट्स थे।
D2C फ़ूड ब्रांड्स: पाँच साल पहले Instagram पर होममेड अचार बेचना अजीब लगता। आज D2C पहाड़ी फ़ूड एक ग्रोइंग श्रेणी है। अर्बन कंज़्यूमर्स ऑथेंटिक, आर्टिज़नल, ट्रेसेबल खाना चाहते हैं। अंकिता ने टाइमिंग सही पकड़ी — इतनी अर्ली कि ब्रांड बना सकीं, लेकिन इतनी अर्ली भी नहीं कि मार्केट ही ना हो।
रूरल इलाक़ाज़ में ई-कॉमर्स: प्रिया ने ख़ास चीज़ देखी: रूरल उत्तराखंड में स्मार्टफ़ोन पेनेट्रेशन तेज़ी से बढ़ रहा था, लेकिन एग्रीकल्चरल ट्रेड अभी भी मंडीज़ और मिडलमैन से होता था। डिजिटल मार्केटप्लेस के लिए इन्फ़्रास्ट्रक्चर अब रेडी था — UPI पेमेंट्स, सस्ता डेटा, हर गाँव में स्मार्टफ़ोन। उनका एग्री-टेक ऐप 5 साल पहले नामुमकिन होता। टाइमिंग ने वायबल बनाया।
अवेयर कैसे रहें
रिसर्च डिपार्टमेंट की ज़रूरत नहीं। बस आँखें और कान खुले रखो:
- ग्राहकों से बात करो। वो क्या माँग रहे हैं जो आप पेशकश नहीं करते? किसकी शिकायत कर रहे हैं? उनकी लाइफ़ में क्या बदला?
- प्रतिद्वंदी को देखो। कॉपी करने के लिए नहीं, बल्कि ये समझने के लिए कि वो किस चीज़ पर रिऐक्ट कर रहे हैं। अगर तीन प्रतिद्वंदी एक साथ होम डिलीवरी शुरू कर रहे हैं तो ग्राहक उम्मीदें में कुछ बदला है।
- उद्योग न्इस्तेमाल पढ़ो। हफ़्ते में 15 मिनट भी काफ़ी है। ट्रेड एसोसिएशन्स, उद्योग WhatsApp ग्रुप्स, गवर्नमेंट स्कीम अनाउंसमेंट्स।
- ट्रेड फ़ेयर्स और मार्केट्स जाओ। रावत जी हर साल Ranikhet की हॉर्टिकल्चर मेला जाते हैं। दो दिन में ऐपल फ़ार्मिंग के बारे में इतना सीखते हैं जितना महीनों अकेले काम करके नहीं सीखते।
- गवर्नमेंट पॉलिसी पर ध्यान दो। सब्सिडीज़, न्यू रेगुलेशन्स, इन्फ़्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स — ये अवसरज़ क्रिएट भी करते हैं और तबाह भी। तिवारी जी ने जो फ़ूड प्रक्रियािंग सब्सिडी बताई, वो रियल है। लेकिन जानना और समझना अलग बातें हैं।
5. SWOT एनालिसिस — व्यावहारिक बनाओ
SWOT सुना होगा — स्ट्रेंथ्स, वीकनेसेज़, अवसरज़, थ्रेट्स। ज़्यादातर लोग स्कूल में सीखते हैं और भूल जाते हैं। इसलिए कि एकेडमिक अभ्यास की तरह पढ़ाया जाता है। चलो उपयोगी बनाते हैं।
रावत जी का SWOT — जूस प्रक्रियािंग यूनिट के लिए
| मददगार | नुकसानदेह | |
|---|---|---|
| इंटरनल (जो आपके कंट्रोल में है) | स्ट्रेंथ्स: अपना बगीचा — रॉ मटीरियल गारंटीड। फ़ैमिली लेबर अवेलेबल। 20+ साल का सेब का ज्ञान। Ranikhet मार्केट में अच्छी रेप्युटेशन। | वीकनेसेज़: फ़ूड प्रक्रियािंग का अनुभव नहीं। लिमिटेड कैपिटल (₹12 लाख सेविंग्स का ज़्यादातर हिस्सा)। मार्केटिंग/ब्रांडिंग हुनर नहीं। रिमोट जगह — डिस्ट्रीब्यूशन लॉजिस्टिक्स महँगा होगा। |
| एक्सटर्नल (जो आपके कंट्रोल में नहीं) | अवसरज़: गवर्नमेंट सब्सिडी (PM FME — 35% तक)। D2C मार्केट बढ़ रहा है नैचुरल/पहाड़ी उत्पाद के लिए। मंडी में सेब के दाम गिर रहे हैं — वैल्यू-ऐडेड उत्पाद कम्पेनसेट कर सकते हैं। बेटे के पास डिजिटल मार्केटिंग हुनर हैं। | थ्रेट्स: दूसरे ऑर्चर्डिस्ट्स भी प्रक्रियािंग शुरू कर सकते हैं (मुक़ाबलािशन)। हार्वेस्ट गुणवत्ता से रॉ मटीरियल दामेज़ फ़्लक्चुएट करते हैं। प्रक्रियािंग के लिए लगातार इलेक्ट्रिसिटी चाहिए (Ranikhet में पावर इश्इस्तेमाल)। FSSAI, पैकेजिंग नॉर्म्स जैसी रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट्स कॉम्प्लेक्स हैं। |
SWOT को ऐक्चुअली इस्तेमाल कैसे करें
ज़्यादातर लोग SWOT बनाते हैं और फिर कुछ नहीं करते। इसे ऐक्शनेबल बनाने का तरीक़ा:
- स्ट्रेंथ्स → लेवरेज करो। रावत जी की गारंटीड ऐपल आपूर्ति सबसे बड़ी स्ट्रेंथ है। हर प्लान इसके ऊपर बना होना चाहिए।
- वीकनेसेज़ → एड्रेस करो या वर्कअराउंड ढूँढो। प्रक्रियािंग अनुभव नहीं है — कोई हायर कर सकते हैं? किसी से साझेदार कर सकते हैं? प्रशिक्षण कोर्स ले सकते हैं? गवर्नमेंट अक्सर फ़्री फ़ूड प्रक्रियािंग प्रशिक्षण चलाती है।
- अवसरज़ → टाइमिंग पकड़ो। सब्सिडी अभी अवेलेबल है — हमेशा नहीं रहेगी। D2C मार्केट अभी बढ़ रहा है — फ़र्स्ट मूवर्स को फ़ायदा मिलता है।
- थ्रेट्स → प्लान बनाओ। इलेक्ट्रिसिटी अनरिलायबल है तो जनरेटर या सोलर सेटअप का बजट रखो। मुक़ाबलािशन आए तो डिफ़रेंशिएट कैसे करोगे?
SWOT की असल वैल्यू ग्रिड में नहीं — स्ट्रक्चर्ड थिंकिंग में है। ये फ़ोर्स करता है कि चारों डाइमेंशन्स कंसिडर करो, बजाय इसके कि सिर्फ़ एक पर फ़ैसला लो (आम तौर पर या तो अवसर की एक्साइटमेंट या जोखिम का डर)।
6. निर्णय प्रक्रिया फ़्रेमवर्क्स
रावत जी का ₹12 लाख का फ़ैसला सिर्फ़ गट फ़ीलिंग से नहीं हो सकता। लेकिन ओवर-एनालिसिस से पैरालाइज़्ड भी नहीं होना चाहिए। तीन व्यावहारिक टेस्ट्स हैं जो कोई भी बिज़नेस ओनर किसी भी बड़े फ़ैसला पर लागू कर सकता है।
टेस्ट 1: रिवर्सिबल vs इर्रिवर्सिबल
पूछो: अगर ये फ़ैसला काम नहीं किया तो अंडू कर सकता हूँ?
- ₹12 लाख की जूस प्रक्रियािंग मशीन ख़रीदना → मोस्टली इर्रिवर्सिबल। मशीन बेच सकते हो, लेकिन 40-50% ही मिलेगा। FSSAI रजिस्ट्रेशन, कंस्ट्रक्शन, प्रशिक्षण — वो टाइम और पैसा ख़र्च हो चुका है।
- पार्ट-टाइम मददर हायर करके लोकल मेला में जूस टेस्ट सेल करना → रिवर्सिबल। काम नहीं किया तो बंद कर दो। ₹5,000-10,000 ख़र्च हुआ और कुछ सीखा।
- 3 साल का लीज़ साइन करना प्रक्रियािंग यूनिट के लिए → इर्रिवर्सिबल। लॉक-इन है।
प्रिंसिपल: इर्रिवर्सिबल फ़ैसले के लिए — धीरे चलो, अच्छे से विश्लेषण करो, एडवाइस लो। रिवर्सिबल फ़ैसले के लिए — जल्दी करो, टेस्ट करो, सीखो।
टेस्ट 2: वर्स्ट-केस टेस्ट
पूछो: अगर ये कम्प्लीटली नाकाम हो गया, तो बच पाऊँगा?
रावत जी का वर्स्ट केस: ₹12 लाख निवेश किया, प्रक्रियािंग यूनिट ने काफ़ी राजस्व जनरेट नहीं किया, 2 साल बाद बंद करना पड़ा।
- ₹12 लाख गए (माइनस सब्सिडी, माइनस इक्विपमेंट की सैल्वेज वैल्यू)
- सेब का बगीचा अभी भी है — बेसलाइन आमदनी जारी है
- फ़ैमिली इमरजेंसी फ़ंड — क्या कोई है? अगर ₹12 लाख ही इमरजेंसी फ़ंड है, तो जोखिम बहुत ज़्यादा है
- सेविंग्स की जगह लोन ले सकते हैं? सेफ़्टी नेट बचा रहेगा
प्रिंसिपल: जो अफ़ोर्ड नहीं कर सकते खोना, वो बेट मत लगाओ। अगर वर्स्ट केस में फ़ैमिली खाना नहीं खा सकती या घर जाता है — तो अपसाइड कितना भी हो, जोखिम बहुत ज़्यादा है।
टेस्ट 3: रिग्रेट मिनिमाइज़ेशन टेस्ट
पूछो: 10 साल बाद, क्या मुझे ये ना करने का पछतावा होगा?
ये वर्स्ट-केस टेस्ट का उल्टा है। इमैजिन करो फ़्यूचर जहाँ सेफ़ खेले:
रावत जी, आज से 10 साल बाद। मंडी में सेब के दाम गिरते गए। पड़ोसी ने 10 साल पहले प्रक्रियािंग यूनिट शुरू की थी, अब पूरे उत्तराखंड में ब्रांडेड ऐपल जूस बेच रहा है। सब्सिडी ख़त्म हो गई। बेटा Bangalore चला गया जॉब के लिए क्योंकि वापस आने के लिए कुछ नहीं था।
क्या रावत जी को पछतावा होगा कि मौका नहीं लिया?
प्रिंसिपल: रिग्रेट मिनिमाइज़ेशन टेस्ट हमारी नैचुरल बायस अगेंस्ट ऐक्शन को काउंटर करता है। हम कुछ करने के जोखिम को ओवरएस्टिमेट करते हैं और कुछ ना करने के जोखिम को अंडरएस्टिमेट करते हैं। कुछ ना करना भी फ़ैसला है — और कभी-कभी सबसे महँगा फ़ैसला।
रावत जी का फ़ैसला — तीनों टेस्ट्स से
| टेस्ट | एनालिसिस | सिग्नल |
|---|---|---|
| रिवर्सिबल vs इर्रिवर्सिबल | मोस्टली इर्रिवर्सिबल — बड़ी कैपिटल ऐट स्टेक | सावधानी से आगे बढ़ो, इम्पल्स से नहीं |
| वर्स्ट केस | नाकाम हुआ तो सेविंग्स जाएँगी लेकिन बगीचा रहेगा। बचनाेबल अगर इमरजेंसी बफ़र रखें | स्वीकारेबल अगर 100% सेविंग्स निवेश ना करें |
| रिग्रेट मिनिमाइज़ेशन | ऐपल मार्केट डिक्लाइन कर रहा है। 10 साल में इनऐक्शन का पछतावा ऐक्शन से ज़्यादा होगा | करने की तरफ़ झुकाव |
बैलेंस्ड तरीक़ा जो रावत जी ले सकते हैं:
- पहले गवर्नमेंट सब्सिडी लागू करो — अप्रूव हुई तो कैपिटल जोखिम 35% कम
- पूरे ₹12 लाख सेविंग्स से नहीं लगाओ — ₹5-6 लाख लोन लो बफ़र बचाने के लिए
- छोटे से शुरू करो — पहले सिर्फ़ ऐपल जूस, बाद में साइडर विनेगर और ड्राइड चिप्स
- मार्केट पहले टेस्ट करो — लोकल मेलों में फ़्रेश जूस बेचो, फिर फ़ुल पैकेजिंग और ब्रांडिंग में निवेश करो
- बेटे को डिजिटल मार्केटिंग आर्म बनाओ — उसके हुनर इस्तेमाल करो, हायर करने की ज़रूरत नहीं
यही अच्छी रणनीति है। "हाँ" या "ना" नहीं — बल्कि "हाँ, इस ख़ास तरीके से, इस पेस पर, इन सेफ़गार्ड्स के साथ।"
7. "ना" कब बोलना है
हर अवसर आपकी अवसर नहीं है। ये शायद सबसे मुश्किल स्ट्रेटेजिक डिसिप्लिन है।
विक्रम की दूसरी फ़्रेंचाइज़ी
विक्रम अपनी Dehradun फ़्रेंचाइज़ी आउटलेट दो साल से चला रहा है। अब फ़ाइनली फ़ायदेमंद है — पहले साल की मुश्किलों के बाद, अब ₹60,000-70,000 मंथली नेट मुनाफ़ा आ रहा है। फ़्रेंचाइज़ी कंपनी तरीक़ा करती है: "अच्छा कर रहे हो। Haridwar में दूसरा आउटलेट खोलना चाहते हैं। तुम्हें फ़र्स्ट राइट ऑफ़ रिफ़्इस्तेमालल। निवेश: ₹22 लाख।"
टेम्प्टिंग है। सिस्टम जानता है। संचालन जानता है। Haridwar में मैसिव टूरिस्ट ट्रैफ़िक है। कंपनी आसान टर्म्स भी पेशकश कर रही है क्योंकि प्रूवन ऑपरेटर है।
लेकिन विक्रम सोचता है:
- Dehradun आउटलेट फ़ायदेमंद है लेकिन स्टेबल नहीं। एक बैड मंथ और ब्रेकईवन पर वापस।
- दो आउटलेट्स दो सिटीज़ में मैनेज करने का मतलब — दोनों जगह फ़िज़िकली प्रेज़ेंट नहीं हो सकता। ट्रस्टेड प्रबंधक चाहिए — और अभी है नहीं।
- ₹22 लाख उधार का पैसा होगा — सेविंग्स नहीं हैं।
- अगर Haridwar संघर्ष करे (और न्यू आउटलेट्स इस्तेमालुअली पहले साल करते हैं), तो Haridwar के लोन पेमेंट्स Dehradun आउटलेट को भी डुबो सकते हैं।
विक्रम ना बोलता है। "अभी नहीं। शायद दो साल बाद जब Dehradun सॉलिड हो और टीम हो जिस पर ट्रस्ट कर सकूँ।"
अवसर लागत
हर "हाँ" एक चीज़ को, कई चीज़ों को "ना" है। यही अवसर लागत है।
अगर विक्रम ₹22 लाख और 50% टाइम Haridwar आउटलेट में लगाता है, तो वो पैसा और टाइम Dehradun बेटर बनाने में नहीं लगा रहा — मेन्यू सुधार करना, स्टाफ़ ट्रेन करना, लॉयल ग्राहक बेस बनाना, मार्जिन्स सुधार करना।
जिस अवसर को हाँ बोल रहे हो, वो बाक़ी सब जिन्हें ना बोल रहे हो उनसे बेटर होनी चाहिए।
हर बड़ी कमिटमेंट से पहले पूछो: "इस पैसे, टाइम, और ऊर्जा से और क्या कर सकता हूँ? क्या ये मेरे लिमिटेड रिसोर्सेज़ का सबसे अच्छा इस्तेमाल है?"
8. मुक़ाबलािशन के बारे में सोचना
हर बिज़नेस के प्रतिद्वंदी हैं। सवाल ये नहीं कि हैं या नहीं — बल्कि ये कि उनके बारे में कैसे सोचते हैं।
ना ऑब्सेस करो, ना अनदेखा करो
दो इक्वली ख़तरनाक एक्सट्रीम्स:
प्रतिद्वंदी पर ऑब्सेस करना: हर मूव देखते हो। हर दाम कट मैच करते हो। हर नया उत्पाद कॉपी करते हो। उनकी Instagram पोस्ट्स पर नींद गँवाते हो। थकाने वाला है, रिऐक्टिव है, और अपने ग्राहकों से ध्यान हट जाता है।
प्रतिद्वंदी को अनदेखा करना: पता नहीं क्या चार्ज करते हैं। पता नहीं क्या पेशकश करते हैं। ध्यान नहीं दिया जब उन्होंने सुधार किया। ये वल्नरेबल बना देता है ब्लाइंडसाइड होने के लिए।
सही तरीक़ा: अवेयर रहो, लेकिन अपने गेम पर सेंटर्ड रहो।
भंडारी अंकल और मुक़ाबलािशन
जब 2 km दूर नई हार्डवेयर शॉप खुली, भंडारी अंकल ने पैनिक नहीं किया। लेकिन अनदेखा भी नहीं किया। उन्होंने क्या किया:
- नई दुकान गए। स्पाई करने नहीं — समझने। क्या उत्पाद हैं? मूल्य निर्धारण क्या है? सेवा कैसी है?
- ग्राहकों से बात की। "सुना नई दुकान खुली बायपास के पास। उनका अनुभव कैसा है?" इससे पता चला नई दुकान क्या अच्छा कर रही है और कहाँ कमज़ोर है।
- अपनी स्ट्रेंथ्स पर डबल डाउन किया। क्रेडिट — नई दुकान क्रेडिट नहीं दे सकती क्योंकि ग्राहकों को जानती ही नहीं। डिलीवरी — भंडारी अंकल मटीरियल कंस्ट्रक्शन साइट पर भेजते हैं, ₹5,000 से ऊपर ऑर्डर पर फ़्री डिलीवरी। एडवाइस — एक यंग कॉन्ट्रैक्टर पाइप साइज़ेज़ पूछने आया, भंडारी अंकल ने काउंटर पर डायग्राम बनाकर समझाया। नई दुकान में कैशियर है, मेंटर नहीं।
- जहाँ ज़रूरत थी एडजस्ट किया। हाई-वॉल्यूम कमोडिटी आइटम्स जैसे सीमेंट जहाँ नई दुकान ₹5-10 सस्ती थी — मैच किया। जहाँ एक्सपर्टीज़ फ़ायदा था — दाम होल्ड किया।
वैल्यू पर मुक़ाबला करो, सिर्फ़ दाम पर नहीं
अगर ग्राहक आपसे सिर्फ़ दाम की वजह से ख़रीदता है, तो जिस दिन कोई सस्ता मिलेगा, चला जाएगा। लेकिन अगर ट्रस्ट, कन्वीनियंस, एक्सपर्टीज़, गुणवत्ता, या रिश्ता की वजह से ख़रीदता है — तो सस्ता विकल्प आने पर भी रुकेगा।
9. योजना vs डूइंग
एक बीमारी है जो बैड रणनीति से ज़्यादा बिज़नेसेज़ मारती है। इसका नाम है एनालिसिस पैरालिसिस — हर फ़ैसला इतना ओवरथिंक करना कि फ़्रीज़ हो जाओ।
योजना का जाल
प्रिया ने 6 महीने बिल्कुल सही एग्री-टेक ऐप बनाने में लगाए। हर फ़ीचर सही होनी चाहिए। UI सुंदर होना चाहिए। पेमेंट इंटीग्रेशन सीमलेस होना चाहिए। लॉन्च पोस्टपोन होता रहा।
फिर एक मेंटर ने बोला: "तुम 10,000 किसानों के लिए बना रही हो। पहले 10 किसान ढूँढो जो इस्तेमाल करें?"
उन्होंने ऐप स्ट्रिप डाउन कर दी — सबसे सिंपल वर्ज़न — बस प्रोड्यूस लिस्टिंग और बायर्स-फ़ार्मर्स कॉन्टैक्ट। कोई पेमेंट इंटीग्रेशन नहीं, फ़ैंसी UI नहीं, लॉजिस्टिक्स मॉड्यूल नहीं। एक तहसील में 50 किसानों के साथ लॉन्च किया।
एक महीने में उन्होंने किसानों की असल ज़रूरत के बारे में इतना सीखा जितना 6 महीने योजना में नहीं सीखा। पेमेंट फ़ीचर? किसी को ज़रूरत नहीं थी — सीधे UPI से सेटल करते थे। लॉजिस्टिक्स मॉड्यूल? वो असल पेन पॉइंट था — किसानों को ट्रांसपोर्ट अरेंज करने में मदद चाहिए थी, बायर्स ढूँढने में नहीं।
6 महीने की योजना गलत फ़ीचर्स पर ध्यान्ड थी। 1 महीने का डूइंग बता गया कहाँ ध्यान करना है।
MVP तरीक़ा
MVP — मिनिमम वायबल उत्पाद — मतलब: अपने आइडिया का सबसे छोटा वर्ज़न बनाओ जो ऐक्चुअली काम करे, रियल इस्तेमालर्स के सामने रखो, और उनकी राय से सीखो।
ये सिर्फ़ टेक स्टार्टअप्स पर नहीं — हर बिज़नेस पर लागू होता है:
- रावत जी का MVP: ₹12 लाख निवेश करने से पहले, 100 बॉटल्स ऐपल जूस घर पर (या किसी रेंटेड फ़ैसिलिटी में) बनाओ, लोकल मेला या WhatsApp से बेचो, और देखो क्या होता है।
- अंकिता का MVP: 5 उत्पाद लॉन्च करने से पहले, सिर्फ़ मिक्स्ड पिकल से शुरू किया। एक उत्पाद, एक Instagram पेज, दोस्तों को Delhi में सैंपल बॉक्सेज़।
- नीमा-ज्योति का MVP: फ़ुल होमस्टे बनाने से पहले, अपने एग्ज़िस्टिंग घर में दो गेस्ट्स को एक वीकेंड होस्ट किया।
नियम: इनफ़ प्लान करो, फिर शुरू करो। चलते-चलते एडजस्ट करो।
बिल्कुल सही प्लान एग्ज़िस्ट नहीं करता। मार्केट आपको वो सिखाएगा जो कोई योजना नहीं सिखा सकती। आपका काम है गुड-इनफ़ प्लान से शुरू करना और ऐक्शन के ज़रिए सुधार करना।
10. लॉन्ग-टर्म थिंकिंग
जब आज की सेल्स, आज की इन्वेंटरी, आज के बिल्स में बिज़ी हो — तो बड़ी पिक्चर भूलना आसान है। लेकिन हर बिज़नेस ओनर को नियमित रूप से पूछना चाहिए: 3 साल बाद मैं कहाँ होना चाहता हूँ?
भंडारी अंकल का सक्सेशन सवाल
भंडारी अंकल 54 साल के हैं। 32 साल की उम्र से हार्डवेयर की दुकान चला रहे हैं। दो बेटे — एक Dehradun में इंजीनियरिंग पढ़ रहा है, दूसरा Delhi में जॉब करता है। किसी ने दुकान में इंटरेस्ट नहीं दिखाया।
ये बात भंडारी अंकल को किसी प्रतिद्वंदी से ज़्यादा सोचने पर मजबूर करती है।
अगर बेटे नहीं लेते तो क्या होगा? वो हमेशा दुकान नहीं चला सकते। बेचें? किसको? किस दाम पर? बाहर से किसी को ट्रेन करें? धीरे-धीरे वाइंड डाउन करें?
ये आज की समस्याएँ नहीं हैं। लेकिन अगर आज इनके बारे में नहीं सोचेंगे, तो 5-7 साल में क्राइसिस बन जाएँगी।
बिल्डिंग vs रनिंग — अलग-अलग फ़ेज़ेज़
बिज़नेस फ़ेज़ेज़ से गुज़रता है, और हर फ़ेज़ में अलग सोच चाहिए:
| फ़ेज़ | मतलब | सबसे ज़रूरी |
|---|---|---|
| स्टार्टिंग | पहले ग्राहकों, आइडिया प्रूव करना | स्पीड, एक्सपेरिमेंटेशन, उत्पाद-मार्केट फ़िट |
| स्टेबलाइज़िंग | लगातार संचालन, फ़ायदेमंद बनना | सिस्टम्स, प्रक्रियाेज़, रिलायबिलिटी |
| ग्रोइंग | एक्सपैंड — नए उत्पाद, मार्केट्स, ग्राहकों | हायरिंग, डेलिगेशन, गुणवत्ता बनाए रख करना |
| मैच्योरिंग | बिज़नेस एस्टैब्लिश्ड, स्टेडी बढ़त | कुशलता, सक्सेशन योजना, मार्केट पोज़ीशन डिफ़ेंड करना |
पुष्पा दीदी स्टेबलाइज़िंग फ़ेज़ में हैं। अंकिता स्टेबलाइज़िंग और ग्रोइंग के बीच। भंडारी अंकल मैच्योरिंग फ़ेज़ में। प्रिया अभी स्टार्टिंग में।
जानो कौनसे फ़ेज़ में हो। उस फ़ेज़ की सही रणनीति लगाओ।
11. रणनीति की आम गलतियाँ
पूरे उत्तराखंड में बिज़नेसेज़ ऑब्ज़र्व करने के बाद — Haldwani के बाज़ारों से Rishikesh के घाटों तक रिमोट कुमाऊँ विलेजेज़ तक — कुछ गलतियाँ बार-बार दिखती हैं।
गलती 1: कॉन्टेक्स्ट समझे बिना कॉपी करना
Almora में एक आदमी ने अंकिता की सफलता देखी — ऑनलाइन पहाड़ी अचार बिक रहा है। सेम उत्पाद लॉन्च कर दिए, सेम मूल्य निर्धारण, सिमिलर पैकेजिंग। लेकिन ना Instagram पालनइंग थी, ना स्टोरी, ना फ़ोटोग्राफ़ी हुनर, ना FSSAI लाइसेंस। 6 महीने में ₹2 लाख निवेश किए और 40 जार्स बिके।
उसने क्या कॉपी किया, कैसे और क्यों नहीं समझा।
अंकिता ने एक साल Instagram प्रेज़ेंस बनाने में लगाया। फ़ोटोग्राफ़ी में निवेश किया। अपनी स्टोरी ऑथेंटिकली बताई। ट्रस्ट धीरे-धीरे बनाया। दिखने वाली सफलता आइसबर्ग की टिप थी — नीचे एक साल का इनविज़िबल काम था।
किसी का बिज़नेस मॉडल कॉपी करने से पहले पूछो: इस इंसान के पास क्या है जो मेरे पास नहीं? उनकी सफलता का कौनसा हिस्सा इनविज़िबल है?
गलती 2: कोर सॉलिड होने से पहले एक्सपैंड करना
विक्रम ने दूसरी फ़्रेंचाइज़ी को ना बोलकर सही किया। बहुत बिज़नेसेज़ दूसरी जगह खोल लेते हैं, नई उत्पाद लाइन ऐड कर लेते हैं, नए मार्केट में एंटर कर लेते हैं — ओरिजिनल बिज़नेस ट्नियमी स्टेबल होने से पहले। फिर दोनों सफ़र करते हैं।
नियम ऑफ़ थंब: कोर बिज़नेस एक हफ़्ते आपके बिना चल सके — तभी कुछ नया लो। अगर नहीं चल सकता, तो अभी सॉलिड नहीं है।
गलती 3: मार्केट बदलाव अनदेखा करना जब तक बहुत देर ना हो जाए
1990s में भंडारी अंकल के इलाक़ा में दर्जन हार्डवेयर शॉप्स थीं। आज चार हैं। जो बंद हुईं, वो एक बुरे दिन से नहीं बंद हुईं। बंद इसलिए हुईं कि अडैप्ट नहीं किया। किसी ने मॉडर्न बिल्डिंग मटीरियल्स स्टॉक नहीं किए। किसी ने डिजिटल पेमेंट्स स्वीकार नहीं किए। किसी ने क्रेडिट नहीं दिया जब मार्केट माँग कर रहा था।
मार्केट लेटर भेजकर नहीं बताता कि "चीज़ें बदल रही हैं।" बस बदल जाता है।
गलती 4: सन्क लागत फ़ैलेसी
शायद सबसे ख़तरनाक ट्रैप।
"₹5 लाख पहले से निवेश कर चुका हूँ। अब बंद कैसे करूँ?"
कर सकते हो। और कभी-कभी करना चाहिए।
₹5 लाख गए — चाहे अब कुछ भी करो। सवाल ये नहीं कि "कितना खर्च कर चुका हूँ?" बल्कि "जो अब पता है, उसके हिसाब से और पैसा लगाऊँ क्या?"
अगर रावत जी का जूस बिज़नेस एक साल बाद हर महीने घाटा में है और सुधार के कोई साइन्स नहीं — तो सही मूव शायद रुकना और बचे ₹7 लाख बचाना है। पहले के ₹5 लाख उस फ़ैसला में फ़ैक्टर नहीं होने चाहिए। वो सन्क हैं। सीखने की लागत है।
गलती 5: रणनीति ही नहीं होना
बहुत स्मॉल बिज़नेसेज़ बैड रणनीति से नहीं नाकाम होतीं। नो रणनीति से नाकाम होती हैं। जो आए — नया प्रतिद्वंदी, ग्राहक माँग, आपूर्तिकर्ता इश्यू — रिऐक्ट करते रहे, बिना किसी गाइडिंग फ़्रेमवर्क के कि बना क्या रहे हैं।
रणनीति होने का मतलब सब जवाब होना नहीं। साफ़ डायरेक्शन होना है जो डेली फ़ैसले को लगातारली गाइड करे।
12. रावत जी की बरामदे पर वापस
जनवरी आ गई। रावत जी ने फ़ैसला ले लिया है।
PM FME सब्सिडी लागू किया। एप्लिकेशन प्रक्रिया होने तक, हल्द्वानी में एक कज़िन की फ़ूड प्रक्रियािंग फ़ैसिलिटी रेंट पर ली — एक दिन के ₹3,000 — और 200 बॉटल्स कोल्ड-प्रेस्ड ऐपल जूस बनाया। बेटे ने सिंपल लेबल डिज़ाइन किया। दाम रखा ₹120 एक 200ml बॉटल।
बागेश्वर की उत्तरायणी मेला में बेचा। दो दिन में 200 बॉटल्स सेल। लोग वापस आकर और माँग रहे थे। मेले में एक दुकानदार ने पूछा कि परमानेंटली स्टॉक कर सकता है क्या।
इससे रावत जी को तीन बातें पता चलीं: उत्पाद काम करता है, दाम काम करता है, माँग है।
प्रक्रियािंग यूनिट अभी नहीं बनाई। सब्सिडी अप्रूवल का वेट कर रहे हैं, और बीच में दो और उत्पाद टेस्ट कर रहे हैं — ड्राइड ऐपल चिप्स और ऐपल साइडर विनेगर। Pantnagar University में एक फ़ूड साइंटिस्ट से शेल्फ़ लाइफ़ और पैकेजिंग पर बात कर रहे हैं।
पत्नी अभी भी कॉशस हैं, लेकिन 200 बॉटल्स सेल आउट होते देखा। बेटा Instagram पेज बना रहा है — @PahariOrchards। पड़ोसी तिवारी जी अब पूछ रहे हैं कि अपने सेब रावत जी की प्रक्रियािंग यूनिट को आपूर्ति कर सकते हैं क्या।
रावत जी ने आँख बंद करके छलांग नहीं लगाई। फ़्रोज़न भी नहीं रहे। टेस्ट किया, सीखा, बना रहे हैं — चरण बाय चरण, आँखें खुली, सेफ़्टी नेट बरकरार।
यही रणनीति है।
पार्ट 1 पूरा हुआ
अगर यहाँ तक पढ़ा है — चैप्टर 1 (बिज़नेस क्या है?) से लेकर इस चैप्टर तक — तो अब फ़ंडामेंटल्स आपके पास हैं। आप जानते हैं बिज़नेस क्या है, पैसा कैसे फ़्लो करता है, मूल्य निर्धारण कैसे करें, बेचना कैसे, मार्केटिंग कैसे, लीगल और टैक्स रिक्वायरमेंट्स कैसे सँभालें, संचालन और पीपल कैसे सँभालें, और अब स्ट्रेटेजिक थिंकिंग कैसे करें।
ये फ़ंडामेंटल्स लागू होते हैं — चाहे चाय स्टॉल चलाओ, हार्डवेयर शॉप, बगीचा, होमस्टे, फ़्रेंचाइज़ी, D2C ब्रांड, या टेक स्टार्टअप। लैंग्वेज और स्केल बदलती है। प्रिंसिपल्स नहीं बदलते।
अब आपके सामने एक चॉइस है — बिल्कुल वैसे जैसे रावत जी के सामने उस दिसंबर की शाम थी।
पार्ट 2: रनिंग & ग्रोइंग अ बिज़नेस आपके लिए है अगर पहले से बिज़नेस चला रहे हैं या ट्रेडिशनल बिज़नेस शुरू करने की सोच रहे हैं — दुकान, रेस्टोरेंट, खेती, सेवा बिज़नेस, फ़्रेंचाइज़ी। इसमें कैश फ़्लो प्रबंधन, बिना एक्सटर्नल फ़ंडिंग के बढ़त, फ़ैमिली बिज़नेस डायनैमिक्स, और एग्रीकल्चर, फ़ूड, लोकल बिज़नेस के लिए उद्योग-ख़ास गाइडेंस है।
पार्ट 3: द स्टार्टअप पाथ आपके लिए है अगर प्रिया की दुनिया जैसा कुछ बना रहे हैं — टेक्नोलॉजी उत्पाद, प्लेटफ़ॉर्म, कुछ जो रैपिड स्केल के लिए डिज़ाइन किया गया हो। इसमें स्टार्टअप थिंकिंग, उत्पाद डेवलपमेंट, मापदंड, फ़ंडरेज़िंग, पिचिंग, और स्केलिंग कवर है।
दोनों में से एक ही चुनना ज़रूरी नहीं। दोनों पढ़ सकते हो। बहुत बिज़नेसेज़ एक से शुरू होकर दूसरा बन जाते हैं। लेकिन पार्ट 1 में जो फ़ंडामेंटल्स सीखे — वो दोनों रास्तों की फ़ाउंडेशन हैं।
रावत जी अपनी बरामदे पर हैं। पुष्पा दीदी अपने स्टॉल पर। भंडारी अंकल अपने काउंटर पर। नीमा गेस्ट वेलकम कर रही हैं। अंकिता ऑर्डर पैक कर रही हैं। विक्रम नंबर्स चेक कर रहा है। प्रिया एक किसान से बात कर रही हैं।
सब कुछ बना रहे हैं। और अब आप भी बना सकते हैं।